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फाग का महीना. ( मनहरण घनाक्षरी पर एक प्रयास)

ढाक अमलतास पे, आ गयी बहार देखो,

सेमर भी कुसुमित, फाग का महीना है |

 

सारे रंग लाल-लाल, फूलों पर दिखाई दें,

कुहु-कुहू कोयल की, राग का महीना है |

 

सूरज का ताप तन, बदन झुलसायेगा,

तपन दहन वह्नि, आग का महीना है |

 

सैर सपाटा सुबह, मन में उल्लास भरे,

नदियाँ तलाव नीर, बाग़ का महीना है ||

 

 

मौलिक / अप्रकाशित.

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Comment

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 9, 2013 at 12:30am

प्रिय अशोक भाई सुन्दर छंद ...मनहरण मनभावन ..मनोहारी ...रंग खिल रहे हैं  

सुन्दर रचना 
भ्रमर ५ 
Comment by Ashok Kumar Raktale on April 5, 2013 at 8:37pm

सादर आभार भाई राम शिरोमणि जी.

Comment by ram shiromani pathak on April 5, 2013 at 12:06pm

आदरणीय श्री अशोक सर बहुत सुन्दर  मनभावन  आपको बहुत बहुत बधाई।

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 5, 2013 at 8:26am

आदरणीय संदीप जी सादर, जी सच है समयाभाव के कारण मैं भी कई दिनों से आपकी गजलों से वंचित रहा हूँ. आपकी शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभार.यूँ ही स्नेह बनाए रखें.सादर.

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 5, 2013 at 8:24am

आदरणीय केवल प्रसाद जी बहुत बहुत आभार.

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 5, 2013 at 8:23am

आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, जी हाँ सुबह सपाटा सैर...  से अवश्य ही सुधार हो रहा है, मुझे लगता है मैं अब इस लय के कुछ और नजदीक पहुँचा हूँ. आपके सुझावों ने इस छंद की गति पर जो प्रकाश डाला है मैं उसे आत्मसात करने का प्रयास करूँगा. सादर आभार.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 5, 2013 at 3:04am

आदरणीय अशोक जी,

कई मास के पश्चात आपकी रचना का रसास्वादन करने के उपरान्त टिप्पणी करने का भी अवसर प्राप्त हुआ है..!! इतने सुन्दर छंद और उतने ही सुन्दर भाव..!! सादर शुभकामनाएँ..

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 4, 2013 at 10:41pm

आदरणीय श्री अशोक कुमार रक्ताले जी,  फाग का महीना है..अतिसुन्दर एवं मनभावन।  आपको बहुत बहुत बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 4, 2013 at 10:24pm

आप द्वारा ही संशोधित घनाक्षरी अच्छी बन पड़ी है.

सैर सपाटा सुबह  के क्रम को ठीक उलट दें तो देखिये स्वर परभी वह पद आ जायेगा, ऐसा मझे प्रतीत हो रहा है.

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 4, 2013 at 9:00pm

कानन पलाश खिले, आयी है बहार नई,

सेमर भी कुसुमित, फाग का महीना है,

सारे रंग लाल-लाल, फूलों पर दिखाई दें,

कुहु-कुहू कोयल की, राग का महीना है,

सूरज तपन तन, बदन अगन भर,

दाह रही तन मन, आग का महीना है,

सैर सपाटा सुबह, मन में उल्लास भरे,

नदियाँ तलाव नीर, बाग़ का महीना है ||

आदरणीय सौरभ जी, भाई संदीप जी, आदरेया सीमा जी सादर मैंने कुछ सुधार करने का प्रयास किया है. क्या मैं सही दिशा में प्रयास कर रहा हूँ? वर्णिक छन्दों में मनहरण मेरे पसंदीदा छंद है.

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