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आज वह अखबार पढते हुए ना जाने क्यों इतना उदास था ! इसी बीच उसकी नन्ही बच्ची ग्लोब लेकर उसके पास आ गई और कहने लगी:
"पापा, आज क्लास में बता रहे थे कि भारत ऋषि मुनियों और पीर फकीरों की धरती है, और उसको सोने की चिड़िया भी कहा जाता है ! आप ग्लोब देख कर बताईये कि भारत कहाँ हैं ?"
उसकी नज़र सहसा अखबार के उस पन्ने पर जा टिकी जो कि हत्या, लूटपाट,आगज़नी, दंगा फसाद, आतंकवाद, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भूख से होने वाली मौतों,धार्मिक झगड़ों और मंदिर-मस्जिद विवादों से भरा पड़ा था ! उसकी बेटी ने एक बार फिर उसका कन्धा झिंझोड़ कर पूछा:
"बताईये ना पापा भारत कहाँ हैं ?"
उसने एक लम्बी सी ठंडी आह भरी, और बेटी के सिर पर हाथ रख कर जवाब दिया:
"मेरी बेटी, जिस भारत कि बात तुम कर रही हो, वो भारत इस ग्लोब में नहीं है !"

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Comment by DEEP ZIRVI on October 19, 2010 at 4:13pm
"बताईये ना पापा भारत कहाँ हैं ?"...
Comment by vikas rana janumanu 'fikr' on October 19, 2010 at 3:44pm
"मेरी बेटी, जिस भारत कि बात तुम कर रही हो, वो भारत इस ग्लोब में नहीं है !

hatss off ...........

bahut sahi vyang kiyaa hai, vyang bhi hai aur peerha bhi
Comment by Abhinav Arun on October 19, 2010 at 1:36pm
अत्यंत विचार परक रचना .बधाई. वास्तव में नयी पीढ़ी देश की जो तस्वीर देख रही है वो किताबों की आदर्श स्थिति से कोसों दूर है. जवाब देही से हम नहीं बच सकते और सवाल बहुत समीचीन है.
Comment by Priti Kumari on October 19, 2010 at 11:56am
बहुत खूब योगराज जी...आपने दिल के तारों को अंदर से झींझोड़ दिया....बच्ची का स्वाभाविक प्रश्न और प्रत्युत्तर की असमर्थता..पूरी कहानी लिख डाली आपने इस लघु कथा के माध्यम से....

कॉटिषः धन्यवाद.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 19, 2010 at 2:28am
कथ्य की आखिरी पंक्तियों की भेदक टीस पर मैं बहुत देर तक बावलों की तरह भन्नाया पड़ा रहा. इस भेदक टीस में किसी चीख की प्रबलता नहीं मर्म को छिन्न-भिन्न कर आहत कर देने वाला उपयुक्त पैनापन है. किसी उद्येश्यपरक निबंध में भी ’क्यों’ इस जोरदार तरीके से कम ही उभर कर आ पाता है. भले उस ’क्यों’ को संतुष्ट करने के क्रम में सारा प्रयास लग जाय. किन्तु यही ’क्यों’ इस लघुकथा के कथ्य में कहीं प्रत्यक्ष नहीं दीखता. किन्तु इसकी परोक्ष उपस्थिति ही पाठक के मानस को हिंडोल कर रख देती है.

हम भुक्त हैं. यह एक सच्चाई है. किन्तु निवाला या ग्रास वही हुआ करता है जो आसन्नरूप से कमजोर हो. इससे पार पाने में जिस ऊर्जा की आवश्यकता होती है उसकी क्षमता के प्रति संदेह और असंतोष हो तो वह ’क्यों’ और भी ज्यादा चुभता हुआ महसूस होता है. हम तथाकथित रूप से ’शिक्षित’ हो गए न, भाईजी, सोही हम राष्ट्र को मिथक का नाम दे बैठे हैं. जिस ’भारत’ को वह नन्हीं बच्ची खोजती दर्शायी गई है उसे यह ’भारत’ संस्कार में मिला है. मगर वह बेचारी क्या जाने कि उसका संस्कार अपनी समस्त गरिमा के बावजूद आज हास्यास्पद हो चुका है. ’आरोपित शिक्षा’ का चश्मा सारा अतीत तिर्यक दिखाता है. कुछ और न दिखावे, अपने सर्व-समुच्चय पर ग्लानि कर अपने को हम न्यून समझें यह अवश्य दिखाता है.

लघुकथा के शिल्प को बेहतर ढ़ंग से सामने लाने के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकर करें. मैं अभिभूत हूँ, योगराजभाई.
Comment by baban pandey on October 17, 2010 at 11:18am
सही है भाई ...अब अच्छी बाते बच्चो के मुह से ही सुनने को मिलती है ...

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 17, 2010 at 10:25am
नवीन भाई जी, आपकी ज़र्रा नवाजी का बहुत बहुत शुक्रिया !
गणेश बागी जी, ये लघुकथा मेरी ८० के दशक में पंजाबी भाषा में लिखी तकरीबन ७५ अप्रकाशित लघुकथायों में से एक है ! कुछ रोज़ पहले ही एक फाईल पुराने घर से मिली जिस में ये रचनाएँ थीं ! आपको रचना पसंद आई - मेरा श्रम सार्थक हुआ !

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 17, 2010 at 10:08am
"मेरी बेटी, जिस भारत कि बात तुम कर रही हो, वो भारत इस ग्लोब में नहीं है !"
आदरणीय योगराज सर, आपकी ग़ज़ल से तो हम लोग परिचित थे पर यह हम लोगो को पता नहीं था की आप इतनी खुबसूरत लघु कथा भी लिखते है, बहुत ही संदेशपरक और विचारणीय लघु कथा है यह, बहुत सुंदर | इस कथा लेखन पर और विजय पर्व दशहरे पर बधाई स्वीकार करे |

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