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हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में
आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१।
*
अवसर समानता का कहे सम्विधान तो
पर  लोकतंत्र  व्यस्त  हुआ  भेदभाव में।२।
*
करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को
फिर से जिला  दिया  है  उसे  ताव-ताव में।३।
*
खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर
हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में।४।
*
सम्पन्न देश हो न हो इतना तो हो मगर
जीवन कटे न एक भी इसमें अभाव में।५।
*
आजाद मुल्क मान लो इतना भी हो अगर
सच का पड़े न साथ जो तजना दबाव में।६।
*
संसद में सत्य बोलना सुनना रुचेगा क्यों
देते वचन जो झूठ  हैं  बढ़चढ़ चुनाव में।७।

***
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2026 at 4:20pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति निखर कर सामने आयी है. सभी शेर के कथ्य सशक्त हैं और बरबस ध्यान खींचते है. 

हार्दिक बधाई 

 

लेकिन आपने मिसरों का विन्यास तो दिया ही नहीं है.

वस्तुतः, आपकी गजल का मिसरा   २२ १२१२ ११२२ १२१२ प्रतीत हुआ है. 

 

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में
आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१।  ................. वाह वाह 
*
अवसर समानता का कहे सम्विधान तो  .......................   संविधान भी 
पर  लोकतंत्र  व्यस्त  हुआ  भेदभाव में।२।
*
करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को  ...............        ’देश ने’ व्याकरण सम्मत नहीं है. 
फिर से जिला  दिया  है  उसे  ताव-ताव में।३।
*
खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर
हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में।४।  ..................   क्या बात है .. वाह वाह 
*
सम्पन्न देश हो न हो इतना तो हो मगर  ...................     तो हो यहाँ .. 
जीवन कटे न एक भी इसमें अभाव में।५। ...............    लेकिन अभाव में  
*
आजाद मुल्क मान लो इतना भी हो अगर
सच का पड़े न साथ जो तजना दबाव में।६। ................   इस मिसरे को तनिक और निखार दें 
*
संसद में सत्य बोलना सुनना रुचेगा क्यों
देते वचन जो झूठ  हैं  बढ़चढ़ चुनाव में।७। ..................   वाह वाह वाह .. 

हार्दिक बधाइयाँ 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 11, 2026 at 3:28pm

आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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