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(ग़ज़ल )...कहाँ मेरी ज़रूरत है

1222 - 1222 - 1222 - 1222

फ़क़त रिश्ते जताने को यहाँ मेरी ज़रूरत है 

अज़ीज़ों को सिवा इसके कहाँ मेरी ज़रूरत है 

मुझे ग़म देने वाले आज मेरी राह देखेंगे 

मुझे मालूम है उन को जहाँ मेरी ज़रूरत है 

मेरे अपने मेरे बनकर दग़ा देते रहे मुझको 

सभी को ग़ैर से रग़्बत कहाँ मेरी ज़रूरत है 

लिये उम्मीद बैठे हैं वो मेरी सादा-लौही पर 

चला आता हूँ मैं अक्सर जहाँ मेरी ज़रूरत है

कभी इतराते हैं ख़ुद पर कभी सहमे हुए से वो

बहुत घबरा के कहते हैं कि हाँ मेरी ज़रूरत है 

ज़रूरत कब रही मेरी तुम्हें ख़ुशियों के मौक़े पर 

मगर.. रखने को सर काँधे पे हाँ मेरी ज़रूरत है 

मेरे हाथों फ़ना मुझको ही कर डाला है जब तुम ने 

बचा ही क्या है अब क्यों नागहाँ मेरी ज़रूरत है 

'अमीर' अब भर चुका दिल भी तमाशा क्यों उन्हें भी तो 

वही ग़ैरों की चाहत है कहाँ मेरी ज़रूरत है 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on December 17, 2021 at 11:09pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद ज़र्रा नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया। सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 17, 2021 at 9:34pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। बहुत खूबसूरत गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on December 17, 2021 at 9:05pm

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद ज़र्रा नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया।  सादर। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 17, 2021 at 8:30pm

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही आदरणीय अमीरुद्दीन जी..होने वाली चर्चा भी सार्थक है...

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on December 11, 2021 at 3:49pm

//यहाँ लगभग निरर्थक है.. इस की जगह मियाँ करेंगे तो एक नया क़वाफ़ी भी मिलेगा और मिसरा अधिक कसावट वाला लगेगा//

आपने ग़ौर नहीं किया क़वाफ़ी इस ग़ज़ल में 'अहाँ' के हैं ।

मुहतरम निलेश जी, आप की बात से मुत्तफ़िक़ हूँ, सिर्फ़ 'आँ' के क़वाफ़ी पर अशआर में नयापन और विविधता के बहुत सारे विकल्प हो सकते हैं और ग़ज़ल कहना भी इसके बनिस्पत काफ़ी आसान होता, मगर अहाँ के क़वाफ़ी पर कितनी ग़ज़लें कही गयी हैं... बहुत कम।

मुझे इस क़ाफ़िया पर ग़ज़ल कहने में भी नयापन महसूस हुआ है, और वैसे भी यह एक मुसल्सल ग़ज़ल है और इस ग़ज़ल की ज़मीन की रू से क़वाफ़ी 'अहाँ' ज़्यादा मुनासिब है।

ग़ज़ल पर आपकी आमद, मशविरे और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया। सादर।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 11, 2021 at 1:49pm

आ. समर सर,

मैंने इसीलिए मतले में बदलाव का बोला है,, उस के बाद सभी क़वाफ़ी ज्यूँ के त्यूं रह सकते हैं.

सादर 

Comment by Samar kabeer on December 11, 2021 at 1:38pm

//यहाँ लगभग निरर्थक है.. इस की  जगह मियाँ करेंगे तो एक नया क़वाफ़ी भी मिलेगा और मिसरा अधिक कसावट वाला लगेगा//

आपने ग़ौर नहीं किया क़वाफ़ी इस ग़ज़ल में 'अहाँ' के हैं ।

 
.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 11, 2021 at 1:20pm

आ. अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब
ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ,,

मतले के ऊला में फ़क़त रिश्ते जताने को यहाँ मेरी ज़रूरत है  यहाँ लगभग निरर्थक है.. इस की  जगह मियाँ करेंगे तो एक नया क़वाफ़ी भी मिलेगा और मिसरा अधिक कसावट वाला लगेगा. 
.
सादर 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on December 10, 2021 at 5:03pm

मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब, आँख के कामयाब आप्रेशन के बाद जल्वा अफ़रोज़ होने पर आपका ओ बी ओ पर पर हार्दिक स्वागत करते हैं। ग़ज़ल पर आपकी आमद, इस्लाह और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया।

इसी उम्मीद बैठे हैं... पर आपकी इस्लाह सर आँखों पर, 'मुझे ही ज़ेर करते हैं... पर भी आपसे सहमत हूँ, कुछ और सोचता हूँ।  सादर। 

Comment by Samar kabeer on December 10, 2021 at 2:53pm

जनाब अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'इसी उम्मीद बैठे हैं वो मेरी सादा-लौही पर'

इस मिसरे का वाक्य विन्यास ठीक नहीं,उचित लगे तो यूँ कर लें:-

'लिये उम्मीद बैठे हैं वो मेरी सादा-लौही पर'

'मुझे ही ज़ेर करते हैं मुझी से लौ लगाते फिर 

वो जब घबरा के कहते हैं कि हाँ मेरी ज़रूरत है'

इस शैर के दोनों मिसरों में मुझे रब्त नहीं लगा, ग़ौर करें ।

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