ग़ज़लों का आनन्द समझ में आ जाए
काश तुन्हें यह छन्द समझ में आ जाए.
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संस्कृत से फ़ारस का नाता जान सको
लफ्ज़ अगर गुलकन्द समझ में आ जाए.
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रस की ला-महदूदी को पहचानों गर
फूलों का मकरन्द समझ में आ जाए.
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दिल में जन्नत की हसरत जो जाग उठे
हों कितना पाबन्द समझ में आ जाए.
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भीषण द्वंद्व मैं बाहर का भी जीत ही लूँ
पहले अन्तर-द्वन्द समझ में आ जाए.
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मन्द बुद्धि का मन्द समझ में आता है
अक्ल-मन्द का मन्द समझ में आ जाए.
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मेरे गीतों में है इक सन्देश छुपा
पढो कि हर इक बन्द समझ में आ जाए.
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निलेश "नूर"
मौलिक/ प्रकाशित/ त्वरित
Comment
धन्यवाद आ. बृजेश जी
आदरणीय नीलेश जी...बहुत शानदार कहा...ग़ज़ल की रवानगी और काफ़िया बहुत जानदार लगा..सादर
आ. अमीरुद्दीन अमीर साहब
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आप ग़ज़ल तक आए इसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया..
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//'ग़ज़लों का आनन्द समझ में आ जाए' मिसरे से आपकी बात और भाव तो स्पष्ट है // आप की इस स्वीकोक्ति से इस मिसरे से जुडी हर बहस बेमानी हो जाती है क्यूँ कि भाषा सम्प्रेषण के लिए होती है.. अगर भाव संप्रेषित हो रहा है तो भाषा अपना काम कर रही है.. भाषा विधान क्या आज्ञा देता है क्या नहीं..वह विधान की समस्या है.. मेरी नहीं.. मेरे श्रोता को मेरी बात समझ आ गयी यह बहुत है ..मंच अनिर्णय की स्थिति में इसलिए है कि कुछ लोग साधारण सी बात, साधारण से छन्द को समझना नहीं चाहते.. मेरे मन में कोई अनिर्णय नहीं है अत: मैं अपनी बात पर यथावत हूँ.
अल्लामा इक़बाल का एक मिसरा है ..
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चराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ... बहस इस पर करें... ये कौन सी ज़ुबान है?... या तो बुझना चाहता हूँ या बुझाना चाहता हूँ... बुझा चाहता हूँ तो किसी तरह भाषा का मुहावरा नहीं है.. बड़े नाम के आगे घुटने टेक देना और सर पर बिठाना ..क्या उचित है?..
बात वही है कि काश ..'ग़ज़लों का आनन्द समझ में आ जाए..
//चाहे किसी के भी लिए और किन्हीं भी अर्थों में क्यों न हो घोर आपत्तिजनक और भावनाएं आहत करने वाला वक्ततव्य है, मैं आप से मांग करता हूँ कि आप तत्काल अपने इस वक्तव्य को वाापिस लेकर कृपया कमेंट बॉक्स से हटा दें। //
यह माँग बात को बिना समझे की गयी है.. मेरी टिपण्णी का अंश किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बल्कि एक जनरल स्टेटमेंट है जो बिलकुल सच है..किसी भी रस में आनन्द तभी आता है जब वह समझ में आ जाए .. और आनन्द भी समझना पड़ता है ..टेस्ट डेवेलोप करनी पडती है.. मैं अब भी कहता हूँ कि आनन्द का आना भी समझ पर टिका हुआ है.. अत: मेरे वक्तव्य में भावनाएं आहत होने जैसा कुछ नहीं है ..
//मगर, ग़लतियाँ करना इन्सानी फ़ितरत है, और ग़लतियों को स्वीकारना इन्सानियत। // आशा करता हूँ कि जब यह छन्द और यह ज़बान जो हम जैसे आम लोगों की ज़बान है, को आप से एलिट समझ लेंगे तो अपनी ग़लती मान कर इंसानियत का परिचय देंगे.
//यौ०—आनंदकंद । ४.तेरह अक्षरों का एक वर्णवत जिसके प्रत्येक चरण में चार यगण और अंत में एक लघु वर्ण होता हे (य य य य ल ) । जैसे,—हरे राम हे राम हे राम हे राम । करो मो हिये में सदा आपनो धाम। //.. अब बताइए.. मुझे ग़लत साबित करने के चक्कर में आप न जाने क्या क्या कॉपी पेस्ट कर गये ..वर्णित उक्ति का कन्द अथवा qand से क्या सम्बन्ध?? आप समझ सकें तो मुझे भी समझावें.
मैं ने यह कब कहा कि संस्कृत का कन्द अरबी में उसी रूप में प्रयुक्त है.. मैं तो शब्द की यात्रा का वर्णन कर रहा हूँ कि कैसे संस्कृत का शब्द कन्द अरब जा कर कालान्तर में अपना अर्थ बदल लेता है... जैसे फरहाद की कहानी में शीर भी संस्कृत के क्षीर से लिया गया है ..और तो और बोलना यानी वद ट्रेवल करते करते वाक्य ..वक और बक बन गया है..
गुल शब्द फ़ारसी है और कन्द संस्कृत से यात्रा करते करते अरब जा क्र qand हो गया और उसने अपना नया अर्थ भी प्राप्त किया..यही मैं कहना चाहता हूँ कि शब्द और भाषा किसी की बपौती नहीं हैं.. शब्द और भाषा अपना मार्ग स्वयं तय करते हैं..
कल को कोई उठ का यह भी कह सकता है कि सिकन्दर का अलेक्सेंडर से कोई सम्बन्ध नहीं है ..समुद्र का समुन्दर से कोई सम्बन्ध नहीं है. भला हो यूनानियों का जो उर्दू और हिन्दी वालों की तरह शब्द की कथित शुद्धता पर अड़े नहीं बैठे हैं वरना उर्दू का 60% साहित्य बेबहर हो जाए ..
आप से निवेदन है कि मेरी ज़ुबान और मुहावरे में खामियां निकालने की जगह अपने उन वरिष्ठों की गलतियाँ उजागर करें जो बड़ी बेशर्मी से स्कूल को इस्कूल पर बाँधते हैं.. मेरी ज़बान वही है जो आम हिन्दोस्तानी बोलता है क्यूँ कि मैं भी कथित एलिट नहीं हूँ.. न उर्दू का न हिन्दी का ..
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ग़ज़ल में और शेर भी थे.. लेकिन खैर ...मेरा एक शेर आपकी नज़र
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ग़ज़ल से ज़्यादा तवज्ज़ुह मिली तखल्लुस को
अगरचे शेर थे बेहतर, हमारा नाम न था ..
शुभ शुभ
आदरणीय निलेश शेवगाँवकर जी आदाब, छंद आधारित ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें।
'ग़ज़लों का आनन्द समझ में आ जाए' मिसरे से आपकी बात और भाव तो स्पष्ट है लेकिन मेरे विचार में शिल्प और व्याकरण की दृष्टि से वाक्य-विन्यास ठीक नहीं है, अगर आपने ऐसा प्रायोगिक तौर पर किया है जैैसा कि आपने कहा भी है //दिक्कत यह है कि आप चाहते हैं कि कोई प्रयोग पहली बार न हो// तो देखना होगा कि क्या भाषा का विधान इसकी आज्ञा देता हैै, इस विषय पर आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी और अन्य भाषाविदों की राय अपेक्षित है, ताकि मंच अनिर्णय की स्थिति से बच सके।
इसी संदर्भ में आदरणीय समर कबीर साहिब की टिप्पणी पर आपकी प्रतिक्रिया चाहे किसी के भी लिए और किन्हीं भी अर्थों में क्यों न हो //किसी पागल को ग़ज़ल में आनन्द नहीं आता क्यूँ कि // समझ// बहुत ज़रूरी है.. // चाहे किसी के भी लिए और किन्हीं भी अर्थों में क्यों न हो घोर आपत्तिजनक और भावनाएं आहत करने वाला वक्ततव्य है, मैं आप से मांग करता हूँ कि आप तत्काल अपने इस वक्तव्य को वाापिस लेकर कृपया कमेंट बॉक्स से हटा दें।
//लेकिन सिर्फ किसी की मान्यता , हठधर्मिता, खोखले तर्क मुझे मुतासिर नहीं कर सकते. यह मेरा सेल्फ बिलीव है ..अपने काम की क्वालिटी मुझे यह तेवर देती है ...//
आप अपने काम क्वालिटी पर काॅन्फ़िडेंट हैं अच्छा है...मगर, ग़लतियाँ करना इन्सानी फ़ितरत है, और ग़लतियों को स्वीकारना इन्सानियत।
//साफ़ है कि qand संस्कृत के कन्द का अपभ्रंश है.. कई आयुर्वैदिक दवाओं में कई कल्प और कई कन्द शामिल हैं.. .. अत: qand को फ़ारसी मान लेना ठीक वैसा ही है जैसे हिन्दी छन्द को समझ न आने पर बहर ए मीर मान लेना और हठधर्मिता से उसे वैसे ही बरतना और इतर कहने वालों को ग़लत ठहराना.//
सिर्फ़ रेख़्ता के स्क्रीन-शाॅट के आधार पर यह कहना कि 'क़न्द' संस्कृत के 'कंद' का अपभ्रंश है' ग़लत है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो फिर 'कंद' और 'क़ंद' दोनों शब्द समानार्थी होते, जबकि ऐसा नहीं है 'कंद' शब्द का अर्थ देखें :
कंद १ संज्ञा पुं० [संस्कृत] १. वह जड़ जो गूदेदार और बिना रेशे की हो । जैसे—सूरन, मूली, शकरकंद इत्यादि । यौ०—जमीकंद । शकरकंद । बिलारीकंद । २. सूरन । ओल काँद । उ०—चार सवा सेर कंद मँगाओ । आठ अंश नरियर लै आओ ।—कबीर सा०, पृ० ५४९ । ३. बादल । घन । उ०—यज्ञोपवीत विचित्र हेममय मुत्तामाल उरसि मोहि भाई । कंद तडित बिच ज्यों सुरपति धनु निकट बलाक पाँति चलि आई ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—आनंदकंद । ४.तेरह अक्षरों का एक वर्णवत जिसके प्रत्येक चरण में चार यगण और अंत में एक लघु वर्ण होता हे (य य य य ल ) । जैसे,—हरे राम हे राम हे राम हे राम । करो मो हिये में सदा आपनो धाम।
जबकि 'क़ंद' शब्द का अर्थ आप बता ही चुके हैं :
'क़ंद' संज्ञा, विशेषण (अरबी) 1. एक प्रकार की दानेदार मिठाई, 2. बर्फ की तरह जमा हुआ शीरा, 3. सफेद शक्कर, 4. जमाई हुई खाण्ड
अब जबकि यह स्पष्ट हो चुका है कि दोनों शब्द समानार्थी नहीं हैं तो ये भी साफ़ है कि 'क़ंद' 'कंद' का अपभ्रंश नहीं है, अर्थात संस्कृत के 'कंद' का फारस के 'गुलक़ंद' से कोई नाता नहीं है। उम्मीद है मैं अपनी बात पहुँचा सका हूँ। सादर।
आ. समर सर,
मेरी पोस्ट पर मेरी ग़ज़ल में उन ऐबों की तरफ़ इंगित करना जो उस में हैं हिन् नहीं..(किसी के मन में हैं) ऊपर से यह आग्रह करना किमैं टिप्पणी न करूं यह दुराग्रह प्रतीत होता है ..
आपने तय किया है की आगे आप इस ग़ज़ल पर टिप्पणी नहीं करेंगे यह आपकी व्यक्तिगत सोच है जिसका मैं सम्मान करता हूँ ..
//बहुत मुमकिन है कि 'खंड' शब्द (जिससे हिंदी में 'खांड' बना है) फ़ारसी के 'क़ंद' का सहोदर हो।// बहुत मुमकिन है... यानी आप स्वयं अपने कहे पर निश्चित नहीं हैं जब कि मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि कन्द संस्कृत का शब्द है.. फ़ारसी ने लिया या न लिया यह मेरे सोचने का विषय नहीं है ..आप और आश्वस्त हो लें ..
// "आनंद समझ में आना" हिंदी/उर्दू का मुहावरा नहीं है।//
मुहावरे ईश्वर ने नहीं बल्कि भाषा बोलने वालों ने बनाएं हैं.. आप जिसे भाषा मानते हों शायद उस में न हो लेकिन आम भारतीय जो भाषा बोलते हैं उस में यह मुहावरा है.. और नहीं है तो आगे हो जाएगा.. दिक्कत यह है कि आप चाहते हैं कि कोई प्रयोग पहली बार न हो.. मीर ने किया हो तो ही प्रयोग मानेंगे .. यह निरी हठधर्मिता है.. तहज़ीब हाफी और जवाद शेख़ आज जो शायरी पाकिस्तान में कर रहे हैं.. वो न केवल नए मुआवरों पर है बल्कि शानदार भी है.. किसी पागल को ग़ज़ल में आनन्द नहीं आता क्यूँ कि // समझ// बहुत ज़रूरी है.. आनन्द होना और उस का समझ आना .. अलग बाते हैं ..
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// छन्दों कहना ठीक न होगा//
क्यों ठीक न होगा भाई जबकि आप ख़ुद कह रहे हैं कि:-
'काश तुम्हें यह छंद समझ में आ जायए'.// ..आशा थी कि आप एकवचन और बहुवचन में भेद समझेंगे लेकिन नकार के भाव ने आप को उससे भी दूर कर दिया ..
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//मीर के शेर में मुहावरे की गड़बड़ी नहीं है,// बिलकुल नहीं है... आपने टिप्पणी पढ़ी नहीं शायद.. मैंने वह शेर महज़ काफ़िया बन्दी के संदर्भ में पेश किया है जिस का मेरे मतले से कतई लेना देना नहीं है .. मन्द वाली काफ़िया बन्दी के संदर्भ में वह बात कही है.. शायद अब आप समझ सकें..
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//इस बह्र की तक़ती'अ मुतक़ारिब में ही होती रही है और वही सबसे बहतर तरीक़ा भी है।// यह उर्दू की बहर है ही नहीं तो इस पर उर्दू की तक्तीअ मानी ही क्यूँ जाए.. सबसे बेहतर तरीका वह है जो पिछले 600 नहीं ३००० साल से जारी है ..
जिसे मीर ख़ुसरो सहित उर्दू के कई शायर अपना चुके हैं.. कई अड़े हुए हैं....
आप यहाँ जवाब न दें ..आपकी मर्ज़ी लेकिन यदि १२१२ स्वीकार्य है तो २१२१२ में दिक्कत सिर्फ वैचारिक है.. हर २१२१ किनी न किनी १२१२ के पहले एक 2 लगा देने बहर का मामला है ..
//लै के आधार पर बह्र तै नहीं होती// मुझे ग़लत साबित करने के चक्कर में आप बेसिक से भटक रहे हैं..
बहर के शाब्दिक अर्थ को समझेंगे तो भी यह समझना आसान है कि समुन्दर में लहरों की आवृत्ति क्या कहती है .. किस बात का सूचक है ..
पहले तो इस बहर का कोई नाम लेकर आइये.. तब इस छन्द पर बहस होगी.. शमसुर रहमान फारुखी साहब न होते तो शायद आप इसे बहर ही न मानतें..
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//और मक़्ते मैं आपने इसे 'गीत' भी कह दिया'// बहुत ही हास्यास्पद..
निदा फ़ाज़ली का मतला है ..
मीर-ओ-ग़ालिब के शेरों ने किसका साथ निभाया है
सस्ते गीतों को लिख लिख कर हमने घर बनवाया है ...
किसी ग़ज़ल में किसी मिसरे में गीत शब्द लिख देने बहर से वह ग़जल से गीत नहीं हो जाता ..ग़ज़ल का कोई शेर किसी अन्य शेर का मुखोपेक्षी नहीं होता..सभी स्वतंत्र होते हैं..अत:
मेरे गीतों में है इक सन्देश छुपा
पढो कि हर इक बन्द समझ में आ जाए... ख़ देने से यह गीत नहीं हो जाता .. यहाँ भी इन गीतों या इस गीत कहीं नहीं लिखा है ..
मुझे लगता है कि मात्रिक छन्द पर कोई ठोस दलील न दे पाने की टीस अबतक आपके मन में है इसीलिए आप एक सड़ी सी बात पर सम्बन्धों में दरार तक पहुँच गये.. कटु से कटु आलोचना भी यदि वह भाव -शिल्प-काव्य पर है तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ लेकिन सिर्फ किसी की मान्यता , हठधर्मिता, खोखले तर्क मुझे मुतासिर नहीं कर सकते. यह मेरा सेल्फ बिलीव है ..अपने काम की क्वालिटी मुझे यह तेवर देती है ... मैं अब भी ओपन हूँ.. कोई बयान मीर का-ग़ालिब का बता दें जिस में मात्रिक छन्द को उर्दू बहर बताया हो और २१२१ को ग़लत बताया हो तो मैं मान लूँगा..
समरी
१) यह हिन्दी का छन्द है जिस में 222 के सभी संभावित कॉम्बिनेशन स्वीकार्य हैं यदि वे लय में हैं तो..
२) 40 साल पहले तक उर्दू के पास इस बहर का नाम नहीं था .. अब भी नहीं है ,,,जो है वह थोपा हुआ है ..
३) आनन्द समझ में आने वाली बात है.. बिना समझ आनन्द नहीं लिया जा सकता
४) छन्दों और छन्द में अंतर है
५) मीर यदि काफ़िया बन्दी करते हैं तो मैं भी कर सकता हूँ..जैसे मैं मीर को कोस रहा हूँ मेरे पाठक मुझे कोसने को स्वतंत्र हैं..
६)कन्द खालिस संस्कृत शब्द है..
७) किसी एक शेर में गीत शब्द लिख देने से वह विधा गीत नहीं हो जाती
८) जो भी सदस्य पड़ें उन्हें यह समझ में आ रहा है कि कौन प्रगतीशील है और कौन रुढ़िवादी.. कौन सटीक तर्क दे रहा है और कौन सिर्फ मान्यताएं परोस रहा है ..
९) लय ही छन्द है..वही बहर है .. लय में न हो वह बहर में हो ही नहीं सकता .. २१२१, १२१२ सिर्फ चिन्ह हैं..
१०) सड़ी सड़ी रचनाओं पर सम्बन्धों में दरार आने की बात कहना / सुनना दुखद है ..
मैं ख़ुद को रोज़ सुधारता हूँ इसीलिए छपने की जल्दी नहीं मचाता .. कि मुझे दिल की तुलना कबाब से कर के शर्मिंदा होना पड़े..
११) आपकी टिप्पणी का इंतज़ार रहेगा
१२) दोस्त अमीर ईमाम याद आ गये..
उनका शेर आपको पता है ..पाठकों के लिए पेश है...
इस शायरी में कुछ नहीं नक्काद के लिए
दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए
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सादर
जनाब निलेश जी, ओबीओ पर आज तक मैंने कोई चर्चा ऐसी नहीं देखी जो किसी नतीजे तक पहुँची हो, चर्चा करने वाले अपनी अपनी बात और तर्क देते रहते हैं,नतीजा ये होता है कि कोई एक अंत में थक जाता है,और यहाँ चर्चा ख़त्म हो जाती है ।
मैं ये अपनी इस पोस्ट पर अंतिम टिप्पणी दे रहा हूँ, और मुझे मालूम है कि आप इससे किसी तरह भी सहमत नहीं होंगे, तो न हों, लेकिन जो सदस्य भी इसे पढ़ेंगे वो यक़ीनन अपने तौर पर समझ लेंगे कि उन्हें किस रास्ते पर चलना है, आपसे भी ये निवेदन करूँगा कि अब इस पोस्ट पर आप मुझे सम्बोधित कर के कोई टिप्पणी न दें, और अगर आपने ऐसा किया तो मैं उसका जवाब नहीं दूँगा ।
संस्कृत और फ़ारसी दोनों में बहुत से मिलते जुलते शब्द हैं। इसकी वज्ह ये है कि ये दोनों एक ही मूल इंडो-आर्यन भाषा की दो शाखाएँ हैं। इसलिए ये कहना कि फ़ारसी का 'क़ंद' संस्कृत के 'कंद' का अपभ्रंश है, ठीक नहीं है। संस्कृत और फ़ारसी में इन शब्दों के अर्थ भिन्न हैं। बहुत मुमकिन है कि 'खंड' शब्द (जिससे हिंदी में 'खांड' बना है) फ़ारसी के 'क़ंद' का सहोदर हो।
ग़ज़ल में सहीह मुहावरे का इस्तेमाल ज़रूरी है। "आनंद समझ में आना" हिंदी/उर्दू का मुहावरा नहीं है। हिंदी/उर्दू में 'आनंद आता है' या 'आनंद का अनुभव होता है'। मीर के शेर में मुहावरे की गड़बड़ी नहीं है, इसलिए इस संदर्भ में उसके उदाहरण का कोई मतलब नहीं है।
बह्र के बारे में मैं पिछले तरही मुशाइर: में जो लिख चुका हैं वो काफ़ी है। इस बह्र की तक़ती'अ मुतक़ारिब में ही होती रही है और वही सबसे बहतर तरीक़ा भी है। लै के आधार पर बह्र तै नहीं होती। अगर एक को लै ठीक लगती और दूसरे को नहीं तो फिर कैसे तय होगा कि बह्र ठीक है या नहीं ।
// छन्दों कहना ठीक न होगा//
क्यों ठीक न होगा भाई जबकि आप ख़ुद कह रहे हैं कि:-
'काश तुम्हें यह छंद समझ में आ जायए'
और मक़्ते मैं आपने इसे 'गीत' भी कह दिया'
उम्मीद करता हूँ कि इस चर्चा के कारण हमारे सम्बंध में कोई दरार नहीं पड़ेगी ।
शुभ शुभ ।
आ. समर सर,
आप ग़ज़ल तक आए इसके लिए साधुवाद ...
आपने कहा कि // छंदों का अच्छा प्रयास है //.. स्पष्ट कर दूँ कि यह एक ही छन्द है जिस में मीर ने कई ग़ज़लें कही हैं अत ..अत; छन्दों कहना ठीक न होगा ..
कन्द के हवाले से एक स्क्रीन शॉट चस्पा है .. देख लें
साफ़ है कि qand संस्कृत के कन्द का अपभ्रंश है.. कई आयुर्वैदिक दवाओं में कई कल्प और कई कन्द शामिल हैं.. .. अत: qand को फ़ारसी मान लेना ठीक वैसा ही है जैसे हिन्दी छन्द को समझ न आने पर बहर ए मीर मान लेना और हठधर्मिता से उसे वैसे ही बरतना और इतर कहने वालों को ग़लत ठहराना.
//जहाँ तक मेरा ख़याल है 'आनन्द" लिया जाता है// असल में आनन्द लिया नहीं जाता.. कोई भाव / स्वाद / सुगंध/ ध्वनी/ ज्ञान अथवा इन्द्रियों से जो समझ में आता है उस के फलस्वरूप आनन्द आता है .. अंदर से आता है.. कहीं बाहर से लिया नहीं जाता ..
ऐसा नहीं होता कि ग़जल की दूकान पर जा कर दो किलो आनन्द पैक करवा के ले लिया जाए.. जब ग़जल समझ आती है तब आनन्द आता है अत: उस मिसरे में //समझ// बहुत सार्थक है.. बिना समझ आनन्द नहीं आ सकता ..गौर कीजियेगा ..
रही बात मन्द की .. तो
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हस्ती अपनी हबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है.
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आतिश-ए-ग़म में दिल भुना शायद
देर से बू कबाब की सी है.... तो यदि ख़ुदा ए सुखन कहलाने वाले मीर इतना वाहियात शेर अपने दीवान में रख सकते हैं तो थोड़ी काफ़िया -बन्दी की छूट सबको होनी चाहिए ...
मुझे उम्मीद थी कि शायद आप इस शेर में अनुप्रास अथवा वर्ड प्ले का आनन्द ले सकेंगे लेकिन अफ़सोस..ऐसा न हुआ..
खैर.... शुक्रिया ..
जनाब निलेश "नूर" जी आदाब , छंदों का अच्छा प्रयास है , बधाई स्वीकार करें I
'ग़ज़लों का आनन्द समझ में आ जाए '--जहाँ तक मेरा ख़याल है 'आनन्द" लिया जाता है ' समझा नहीं जाता I
'संस्कृत से फ़ारस का नाता जान सको
लफ्ज़ अगर गुलकन्द समझ में आ जाए'--इस शे`र में क्या कहना चाहते हैं समझ में नहीं आया क्यों कि "गुल क़ंद" फ़ारसी का है और
हिन्दी या संस्कृत में 'कंद' है और दोनों का कोई मेल आपस में नहीं है I
'मन्द बुद्धि का मन्द समझ में आता है
अक्ल-मन्द का मन्द समझ में आ जाए'---'मंद' शब्द का फ़ारसी अर्थ है लाहिक़-ए-सिफ़त,निस्बत जो किसी इस्म के बाद आकर उसे सिफ़त बना देता है और वाला,साहिब का अर्थ देता है जैसे दानिश मंद,अहसान मंद,अक़्ल मंद व्ग्ग़ैर: ,उम्मीद है समझ गये होंगे I
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