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ग़ज़ल-गीत आशिक़ाना हो

2122 1212 22/112

 1

उसका जब मेरी कू में आना हो

उठ चुका ग़म का शामियाना हो

2

मिल रहा प्यार जब पुराना हो

लब प तब गीत आशिक़ाना हो

3

हिज्र की रात में वो आए जब

होटों पर वस्ल का तराना हो

4

ऐ ख़ुदा हर गरीब के घर में

पेट भरने को आब ओ दाना हो

5

टूटी कश्ती में बैठ कर कैसे

उस किनारे प अपना जाना हो

6

कह रहा है मरीज़-ए-इश्क़ मुझे

उसका दिल मेरा आशियाना हो

7

तर्क पर तर्क यूँ दिए उसने

जैसे मक़सद जिरह बढ़ाना हो

8

दिल की दीवारें ऐसी हैं " निर्मल"

जैसे जाँ लेवा क़ैद खाना हो

मौलिक व अप्रकाशित

 रचना निर्मल

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 26, 2021 at 1:17pm

आ. रचना बहन सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई। गुणीजनो के सुझाव से यह और निखर जायेगी। सादर..

Comment by Ravi Shukla on August 26, 2021 at 12:32pm

आदरणीया रचना जी  अच्छी गजल कही आपने आदरणीय समर साहब की बातों से और स्पषट हो गई है  ग़ज़ल 

Comment by Rachna Bhatia on August 21, 2021 at 7:20pm

आदरणीय समर कबीर सर् नमस्कार। सर्, जी, फेयर में सुधार कर लेती हूँ। बेहद शुक्रिय:।

Comment by Samar kabeer on August 21, 2021 at 3:48pm

'तर्क पर तर्क यूँ दिए उसने

"जैसे नीचा मुझे दिखाना हो"

ठीक है ।

Comment by Rachna Bhatia on August 19, 2021 at 7:52pm

आदरणीय समर कबीर सर् नमस्कार।सर् बहुत अच्छी इस्लाह दी आपने। आभार ।सर् बहुत कोशिश के बाद भी मैं ' गली ' शब्द नहीं ला पाई थी। आपने बहुत आसानी से उसे ले आए। इसके लिए व नुक़्तों के लिए विशेष आभार।

इस शे'र का सानी क्या इस तरह ठीक रहेगा

तर्क पर तर्क यूँ दिए उसने

"जैसे नीचा मुझे दिखाना हो"

सादर।

Comment by Samar kabeer on August 19, 2021 at 6:31pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'उसका जब मेरी कू में आना हो'

इस मिसरे को यूँ कहें:-

'उसका जब इस गली में आना हो'

'ऐ ख़ुदा हर गरीब के घर में'

गरीब--"ग़रीब"

'कह रहा है मरीज़-ए-इश्क़ मुझे'

इस मिसरे में 'मुझे' की जगह "मुझसे" होना चाहिए,उचित लगे तो मिसरा यूँ कह सकती हैं:-

'कहता है मुझसे ये मरीज़-ए-इश्क़'

'जैसे मक़सद जिरह बढ़ाना हो'

इस मिसरे में 'जिरह' शब्द ग़लत है,सहीह शब्द है "जर्ह" 21 देखियेगा ।

'जैसे जाँ लेवा क़ैद खाना हो'

क़ैद खाना--"क़ैद ख़ाना"

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