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कोई बिका तो लाया है कोई खरीद कर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

कोई बिका तो लाया है कोई खरीद कर
दुनिया में आज हो रही शादी खरीद कर।१।
**
हम हर गली या चौक पे चर्चा में व्यस्त हैं
लाला चलाता  देश  है  खादी खरीद कर।२।
**
पाया अधिक तो हो गया दुश्मन की ओर ही
किसका हुआ  वकील  है  वादी खरीद कर।३।
**
रखता बचा के  कौन से जीवन के हेतु वो
बच्चों को लोभी देता न टाफी खरीद कर।४।
**
खुद खाके भूख माँ ने खिलाया था कौर इक
कमतर उसे जो दें  भी  तो  रोटी खरीद कर।५।
**
कर्मों से जो मिले हैं वो कर्मों से धोइये
मिटते नहीं हैं दाग ये धोबी खरीद कर।६।
**
बेमोल मिलता कुछ नहीं दुनिया जहान में
पीड़ा भी पायी हमने तो साथी खरीद कर।७।


मौलिक अप्रकाशित
-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 31, 2021 at 4:33pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । आपकी उपस्थिति से गजल मुकम्मल हुई...आभार।

Comment by Samar kabeer on May 31, 2021 at 2:50pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 30, 2021 at 10:10pm

आ. भाई आज़ी तमाम जी, अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Aazi Tamaam on May 30, 2021 at 7:54pm

सादर प्रणाम आ धामी सर

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है आज के परिपेक्ष्य में

सादर

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