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ग़ज़ल-उदासी इस क़दर मुझमें उतरती जा रही है

1222      1222      1222      122

ग़मों की दिन-ब-दिन क़िस्मत सँवरती जा रही है
उदासी इस क़दर मुझमें उतरती जा रही है

अभी तो वक़्त है पतझर के आने में,हवा क्यों
चली ऐसी कि मन वीरान करती जा रही है

बहारों ने चमन लूटा मगर बाद-ए-सबा ये 
खिज़ाओं पे हरिक इलज़ाम धरती जा रही है


फ़िराक-ए-यार का मौसम बहुत नज़दीक आया
विसाल-ए-यार की उम्मीद मरती जा रही है

उसे तो भा रही है अब ज़माने की रिवायत
यहाँ अपनी मुहब्बत भी निखरती जा रही है

कोई सूरत नहीं है चाँद के दीदार की 'ब्रज'
शब-ए-ग़म आँसुओं के साथ झरती जा रही है
​(मौलिक एवं अप्रकाशित) ​
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 19, 2021 at 6:56pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब,  अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ।  सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 19, 2021 at 4:36pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई । शेष संवरती को सँवरती कर लिजिएगा।

Comment by नाथ सोनांचली on March 19, 2021 at 3:35pm

आद0 बृजेश जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल कही है आपने। बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Samar kabeer on March 19, 2021 at 2:06pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

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