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22 22 22 22 22 22 22

तुझसे मिलकर हम जो रो लेते तो अच्छा होता..
जख्मी दिल को नमक से धो लेते तो अच्छा होता।


हम अपने सर को रखकर कुछ पल तेरे दामन में..
कतरा कतरा आँसू बो लेते तो अच्छा होता।

सहरा सहरा दरिया दरिया पर्वत पर्वत वन वन..
पल भर खुद को खुद से खो लेते तो अच्छा होता।


हर पल है जब आंखों में तेरे सपनों का जगना.
कोई दिन हम तुझमें सो लेते तो अच्छा होता।

जब अपनों के हो न सके,तेरा होना हो न सका
'जान' से अब हाथों को धो लेते तो अच्छा होता।

.

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 16, 2021 at 9:27pm

आदरणीय समर सर बेहद शुक्रिया हार्दिक वंदन।

Comment by Samar kabeer on March 15, 2021 at 7:37pm

जनाब जान गोरखपुरी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 15, 2021 at 5:46pm

ज़र्रानवाज़ी के लिए आपका बहुत शुक्रिया आ. रचना जी।

आत्मविस्मृति का भाव है...इसलिए खुद को खुद "से"।

Comment by Rachna Bhatia on March 13, 2021 at 9:13am

आदरणीय कृष मिश्रा जी नमस्कार। अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई।

ख़ुद को ख़ुद 'में'

बेहतरीन, वाह

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