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नेता कम - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२


देश की सुन्दर तस्वीरें अब रचने वाले नेता कम
सच में जन के हित में नेता बनने वाले नेता कम।१।
**
बाँट रहे  हैं  जाति-धर्म  में  दशकों  पहले जैसा ही
एक रहो सब देश की खातिर कहने वाले नेता कम।२।
**
सब धनिकों का पक्ष उठाते अपनी अण्टी भरने को
अब निर्धन की पीड़ाओं  को  सुनने वाले नेता कम।३।
**
ठाठ  पुराने  राजा  जैसे  अब  हर  नेता अपनाता
लाल  बहादुर  जैसे  सादा  रहने  वाले  नेता  कम।४।
**
चाहत में कुर्सी की  करते  देश से गद्दारी तो नित
पर दुश्मन से देश हितों में भिड़ने वाले नेता कम।५।
**
खून खराबा बात बात पर करने की सब कहते हैं
सत्य अहिन्सा की बातों पर चलने वाले नेता कम।६।


मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 17, 2020 at 9:27am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 16, 2020 at 12:12pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी सादर नमस्कार 

अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारें 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 7, 2020 at 11:00am

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, अनुमोदन व मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार । 

मतले में सुधार का प्रयास करता हूँ । यदि आपके विचार में कोई शोधन हो तो सुझाईएगा । सादर...

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 7, 2020 at 9:00am

आ. लक्ष्मण जी 
आपकी रचना के भाव उत्कृष्ट हैं लेकिन ग़ज़ल के लिहाज़ से काफ़िया दुरुस्त नहीं है मतले में.
रचने और बनने दोनों योजित शब्द हाँ यानी रच और बन के एक्सटेंशन्स. चूँकि रच और बन दोनों में काफ़िया नहीं है और दोनों सार्थक ही है (जिनका अर्थ है) अत यह काफ़िया दोषपूर्ण है.
सादर 

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