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मेरा सीमित प्यार तुम्हे आयाम चाहिए

सीता बनना कठिन पर तुम्हे राम चाहिए
बाबुल का घर छोड़
आत्म अनुमति से आई
नर के दृढ भुजपाश
में सदा तृप्ति समाई
अब गंगोदक छोड़ तुम्हे क्यों जाम चाहिये 
मुझमे पाती त्राण
कहाँ विश्वास खो गया ?
उर में बसते प्राण
आज क्यों स्वप्न हो गया ?
वह मादक मनुहार तुम्हे अविराम चाहिए I
पावन मंगल-सूत्र
आज क्या नाग हो गए ?
माथे का सिदूर
कहो कब आग हो गये ?
तुमको कैसा साथ प्रिये अभिराम चाहिए
घर का मधु उद्यान
बन गया कब से कारा ?
मेरा हर उच्छ्वास
बना उत्पीडन सारा I
भरा मुक्ति का राग, अहो घनश्याम चाहिए
रति स्थायी भाव
मुझे शृंगार ज्ञात है I
हां अब भी है याद
सखे वह मदिर रात है I
तुम्हे न वह रसधार, तड़ित उद्दाम चाहिए

(मौलिक/ अप्रकाशित )

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Comment by Saurabh Pandey on September 2, 2020 at 6:05pm

अंतर्निहित उत्कट-भावों को समर्थ शब्द तथा सुगढ़ विन्यास मिले हैं.

सादर बधाइयाँ, आदरणीय गोपाल नारायनजी

 

 

अलबत्ता, ’कठिन’ को पचा पाना मेरे लिए वस्तुतः कठिन हो रहा है. मैं शब्दकल के अनुसार इसके ’न’ को मात्र एक मात्रिक लघु न देख कर ’ठिन’ के युग्म के तौर पर ही देखूँगा. यह वाचिकता ’कठिन’ को क+ठिन के रूप में ही प्रस्तुत करती है. 

वैसे जानता हूँ, आप नहीं मानेंगे. यह एक स्वीकृत हो चुकी भूल का बलात निर्वहन है जिसे एक भरा-पूरा वर्ग आंचलिक भाषा की कसौटी पर मान्य परंपरा को हिंदी के कांधों पर भी लादने को लेकर हठी है.  

शुभातिशुभ

Comment by आशीष यादव on August 25, 2020 at 11:27pm

बिल्कुल सच्चे भावों से बनी है यह रचना। एक बेहतरीन गीत है।

Comment by Samar kabeer on August 25, 2020 at 3:44pm

जनाब गोपाल नारायण जी आदाब, अच्छा गीत लिखा आपने, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on August 24, 2020 at 8:43pm

परम् आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, सादर प्रणाम ... अद्भुत,अनुपम और अप्रतिम सृजन ... भावों की कल कल करती धारा इस ह्रदय पर अपनी अमिट छाप छोड़ गई। दिल की असीम गहराईयों से आपको हार्दिक बधाई और सादर नमन।

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