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पिघलता क्षण



जब ढल जाती है रात

कृष्ण-पक्ष की काली गह्वर सी अकेली,

एक सितारा टिमटिमाता हुआ

उलटा लटका सा नज़र आता है.

शय्या पर बैठी उनींदी,

एक सांस खींचती गहरी सी,

खोलती हूँ जब आँखें पूरी

दूर कहीं निगाह भटक जाती है.

निःस्तब्ध रात्रि और मेरा अकेलापन

अपने विचारों को समेटती,

अनगिनत नक्षत्रों को गिनती

रहती हूँ शून्य में खोई सी.

दूर कहीं बादल भटकते,

कुछ यादें शूल से चुभते,

बाग में पत्रहीन वृक्ष भीड़ में…

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Added by coontee mukerji on March 15, 2013 at 8:41pm — 4 Comments

ग़ज़ल - एक मुसलसल जंग सी जारी रहती है

एक मुसलसल जंग सी जारी रहती है --

जाने कैसी मारा मारी रहती है --

 

एक ही दफ़्तर हैं, दोनों की शिफ्ट अलग

सूरज ढलते चाँद की बारी रहती है --

 

भाग नहीं सकते हम यूँ आसानी से

घर के बड़ों पर…

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Added by विवेक मिश्र on March 15, 2013 at 8:00pm — 22 Comments

पश्चिमी राजस्थान में मीठे पानी का स्रोत- जोहङ

(मौलिक व अप्रकाशित)



राजस्थान में जोहङों और कुओं का अपना महत्त्व है। राजस्थान में ही क्यों, पूरे भारतवर्ष में जोहङ मिल जाएँगे और उनकी स्थानिय उपयोगिता भी मिल जाएगी। हाँ नाम आपको अलग अलग मिलेंगे। कहीं ये जोहङ, गिन्नाणी, ताल, तलैया के नाम से जाने जाते हैं तो कहीं इनको डैम, धरण, डेर कहा जाता है।

जोहङों का सबसे ज्यादा महत्त्व राजस्थान में है जहाँ सबसे कम वर्षा होती है और पीने का पानी बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। इसलिए बरसाती पानी को एकत्र कर पीने के काम मेँ लाने के लिए गाँव के… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 15, 2013 at 6:45pm — 6 Comments

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें (3)

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें में सब अतिथि  blogers का स्वागत है. आप के पर्संसात्मक comments का धन्यवाद यह एक लम्बी काव्या कथा है कृपया बने रहें. कोशिश करूंगा आप को निराश न करूं. यदि रचना बोर करने लगे तो कह देना. 

Dr. Swaran J. Omcawr

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें (3)

गंगा कहती रहीं- ज्ञानि सुनता रहा

‘तुम इतना ताम-झाम करते हो!



इतनी…

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Added by Dr. Swaran J. Omcawr on March 15, 2013 at 3:00pm — 10 Comments

तात मान एक बात (मनहरण घनाक्षरी)

देश में विदेश के सलाहकार सेनदार,
प्रीति में अनीति रीति, भूल के न लाइये।
नीतिवान बुद्धिमान, राजकाज जानकार,
नेक राज एक बार, देश में बनाइये॥
जाति-पांति भेद-भाव, ऊँच-नीच के दुराव,
हैं समाज कोढ़-घाव, दूर छोड़ आइये।
देवियाँ करें पुकार, तात मान एक बात,
लाज आज नारियों कि, देश में बचाइये॥

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 15, 2013 at 2:41pm — 5 Comments

धप्पा

जब भी मै गयी 

स्टोर में
या अटारी में
या खेत के गोदाम में

उठाने पुरानी यादें
जहाँ कोई नही जाता
मेरे तुम्हारे सिवा
एकदम से तुम आ गये
धीरे से ..और 
जोर से डरा दिया मुझे
धप्पा!!

           - 'वेदिका'

Added by वेदिका on March 15, 2013 at 11:30am — 6 Comments

सत्य सनातन व्याकुल होकर देख रहा अपने उपवन को

सुप्रभात मित्रों , आप सभी के अवलोकन हेतु सत्य सनातन पर लिखी अपनी कुछ पंक्तियाँ | सादर



सत्य सनातन व्याकुल होकर देख रहा अपने उपवन को

खर -पतवार सरीखे मजहब खा जायेंगे सुन्दर वन को ||

मैंने ही सारी वशुधा को एक कुटुंब पुकारा था

मेरी ही साँसों से निकला शांति पाठ का नारा था ||

दया धर्म मानवता जैसी सरल रीत मैंने सिखलाई

परहित धर्म आचरण शिक्षा मैंने ही सबको बतलाई ||

क्या हालत कर दी हे मानव भूल गया क्यूँ अंतर्मन को

खर -पतवार सरीखे मजहब खा जायेंगे सुन्दर…

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Added by Manoj Nautiyal on March 15, 2013 at 9:15am — 3 Comments

दोहा

(आदरणीया डा0 प्राची सिहं जी के सुझाव के बाद पुनः प्रस्तुत)



भ्रष्टाचार जड़ विकट, माया मन परतोष।

कहे सुने बढ़ जात है, अहम काम मद दोष।।1



पंडित वेद कुरान पाठ, करि सब भये मसान।

नेता भ्रष्ट भय आतंक, सब बनगै श्रीमान।।2



भ्रष्टाचार बन जग गुरु, लूटें देश समूल ।

रामदेव अन्ना लड़े , लिये हाथ मा तूल।।3



जनता निरी गाय-भैंस, लठैत है सरकार।

दूध दुहन को वोट है, फिर पीछे मक्कार।।4



नेता सब ज्रागत भये, सोवत सन्सद बीच ।

जनता…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 15, 2013 at 6:30am — 5 Comments

दोहा

मन मंगल मन मीत है, मन मारूत मन मीन!

मन मारत मन जीत है, मन मान मन मलीन!!1



पानी पियास हरि कहें, तुरतहि तन में वारि!

तोय भुलावत रोग बढे़, पावत पय उध्दारि!!2



हरि हरि हरिनाम रसना,हर हर भव जस जान!

हरि हर हार जात विधना,हरि नारद अस मान!!3



जपत निरन्तर राम राम, तन मन में सिय राम!

अहम को जय राम कहें, विनय भजे श्री राम!!4



रस रसे रस चाहना, रस रस कर रस जाय!

रस रस कर रस बांटना, रस रस मन हरषाय!!5



हरि अनन्त हरि संत है,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 15, 2013 at 5:00am — 3 Comments

एक गज़ल - क्या कहें !!!

शाम को नजरें मिली यूँ, क्या कहें

आस की उपजी कली यूँ, क्या कहें



बात आँखों से चली यूँ, क्या कहें

खिल उठी मन की गली यूँ, क्या कहें



रूह से गोरी-सलोनी सी लगी

देह से वो साँवली यूँ, क्या कहें



धूप उस पर जुल्म करना छोड़ दे

जो है मक्खन की डली यूँ, क्या कहें



मिल भी जाते गर कदम तकदीर में

पर हमारी कुण्डली यूँ, क्या कहें



वो रियासत…
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Added by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 14, 2013 at 11:28pm — 12 Comments

गणात्मक “मनहरण घनाक्षरी “

गणात्मक “मनहरण घनाक्षरी “

(रगण जगण)x2 +रगण+लघु, (रगण जगण)x2 +रगण

(चार चरण प्रति चरण ३१ वर्ण १६,१५ पर यति)

 

आन बान शान ध्यान, में रखे उठो जवान

मान देश का घटे न, स्वाभिमान लाइए

कर्मशील धीर वीर, सत्य मार्ग में रुके न

काम क्रोध मोह त्याग, धर्म को बढाइये

भूल लोक-लाज धर्म, जो हुआ युवा अचेत

रीत प्रीत शंख फूंक, नींद से जगाइए

लाज नार की लुटे न, देवियाँ यही महान

नारियाँ पुनीत पूज्य, देश में बचाइए

 

संदीप पटेल…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 14, 2013 at 10:46pm — 1 Comment

राज गहरे कई

ये फिजाएं खोलती हैं राज गहरे कई

इस कली में बंद हैं नादान भौंरे कई

 

हम तो आशिक हैं हमारा क्या बहल जाएंगे

आपके दामन पे हैं ये दाग गहरे कई

 

देर तक खामोश सी रोती रही जिंदगी

छूटते हैं जो यहां…

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Added by बृजेश नीरज on March 14, 2013 at 10:00pm — 6 Comments

अखबार की सुर्खियाँ (घनाक्षरी छंद)

सैनिक शहीद हुए, फिर नाउम्मीद हुए,
मौन सरकार आज, कोई तो बुलाइये।

राज फरमान जारी, सोलह की उम्र न्यारी,
प्यारियों से रास खूब, जमके रचाइये॥

कानून गया भाड़ में, खुदकुशी तिहाड़ में,
खोखली सरकार को, जड़ से मिटाइये।

माँ भारती पुकारती,हैं देवियाँ गुहारती,
लाज आज नारियों की, देश में बचाइये॥

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2013 at 8:55pm — 1 Comment

प्रिय की प्रतीक्षा

अकेले क्यों आये हो तुम ऋतुराज,

क्यों नहीं साथ लाये मेरे प्रिय को आज?

उनकी प्रतीक्षा में थक गए नैन,

अधरों से मेरे फूटते नहीं है बैन।

 कटती नहीं मुझसे विरह की रैन,

आता नहीं मेरे मन को कहीं चैन।

उनके बिना होता नहीं कोई काम -काज।

अकेले क्यों आये हो तुम ऋतुराज,

क्यों नहीं साथ लाये मेरे प्रिय को आज?

बिना उनके फीका सौन्दर्य तुम्हारा,

कोयल के गीतों ने भी उन्हें पुकारा।

बिना प्रिय के अधूरा श्रृंगार हमारा,

काम -बाणों ने बेध दिया तन-मन सारा।

तुमसे ये…

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Added by Savitri Rathore on March 14, 2013 at 8:05pm — 5 Comments

पार्थ और केशव

मैं अर्जुन भौतिक अनूसारा। तिरगुण पुट अखण्ड लाचारा।।

नाथ हृदय अति दीर्घ संदेहू। नश्वर देहि आपहु धरेहू ।।

तुम प्रभु सर्व समर्थ सनाथा। अष्ट योग-चैबिस तत्व गाथा।।

त्रिअवस्था अखण्डहि बृन्दा। होइ कोउ तुम्हारा गोविंदा ।।

हम भीरू कल्मष अनुरागी । मेरे ईष्ट कुटुम्ब अभागी ।।

हम गुरू पितु मातु बंधु के हंता।केहि विधि सुफल राज के संता।।

आपहु भौतिक रूप आचारू। गुरू पितु मात बंधु व्यवहारू।।

कस होइ हित बधे कुटुम्बा। क्षत्रिय नाम विलास अचम्भा।।

आपहु अंश-भिन्नांश न जानें ।…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 14, 2013 at 7:16pm — 2 Comments

आयो होली का त्यौहार

आयो होली को त्यौहार

रंग सतरंगी लेकर आई एक छैलछबिली नार,

आ के पास कर गई मेरे रंग बिरंगे गाल ।

कि आयो होली को त्यौहार्, कि आयो होली को त्यौहार् ॥.…

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Added by बसंत नेमा on March 14, 2013 at 2:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल "है ज़रा मुश्किल मगर रब राहबर मेरा भी है"

झूठ की गलियों में सच तक का सफ़र मेरा भी है

है ज़रा मुश्किल मगर रब राहबर मेरा भी है

बेबफा तुझसे बिछड़कर हाले दिल अब क्या कहें

जो उधर है हाल तेरा वो इधर मेरा भी है

मुंतज़िर होना नहीं खलता है हमको अब सनम

वक़्त का पाबंद तुझ सा मुंतजर मेरा भी है

दूध पीने की खबर पर यूँ पुजारी कह पड़े

संग में रब है मगर कुछ तो हुनर मेरा भी है

टूट कर बिखरा हुआ इक आइना इतरा रहा

शहरे बुत में हो रही हलचल असर मेरा भी…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 14, 2013 at 1:13pm — 7 Comments

दोहे

राष्ट्र् पिता परमात्मा, परम सनेही जान!
विश्व सकल परिवार है, अन्तरमन लें ठान!!

भाषा तुलसी दास सी, भाव हो शशी सूर !
देश का सम्मान बढे़, संवाद निरमल नूर!!

राष्ट्र् मेरा भारत मा, कमल तिरंगा शेर !
मयूरा नाचत दिल मा, रहा चक्र् को फेर!!

अच्छा संस्कारी देश, भारत जिसका नाम!
सदियों से यह पल रहा,मिला हड़प्पा शान!!
के’पी’सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 14, 2013 at 12:38pm — 3 Comments

नारी का मन

 

                                                          नारी का मन

                                          तुम समझ  सकोगे  क्या ? ...

                                 कि मेरी झुकी समर्पित पलकों के पीछे

                                 सदियों से स्वरहीन

                                 मेरी मुरझाई आस्था आज…

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Added by vijay nikore on March 14, 2013 at 12:30pm — 22 Comments

बसन्तागमन का स्वागत

(मौलिक व अप्रकाशित रचना)



दिनकर रश्मियाँ मार्ग खोजती

चली शनैः शनैः वसुन्धरा पथ

तिमिर अकङता जकङे रहता

जोर लगाता वसुन्धरा ललाट

आलोक को विलोक तिमिर

विस्मृत करता स्वबल शक्ति

दिनकर रश्मियाँ पहुँच वसुन्धरा

मानव मानस भाव उपजाती

रमणी वसुन्धरा श्रृंगारित होती

केश मोगरा पुष्पदल सजाती

केसर मिश्रित टीका लगाती

कर्ण हरसिंगार फूल पहनती

मस्तक ओढे धानी चुनरिया

सप्तरंगी पुष्पमाल उर सुशोभित

कलाई गुलाबी कंगना डारे

हस्त गेंदा पहरे… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 14, 2013 at 12:26pm — 4 Comments

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