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ग़ज़ल "है ज़रा मुश्किल मगर रब राहबर मेरा भी है"

झूठ की गलियों में सच तक का सफ़र मेरा भी है
है ज़रा मुश्किल मगर रब राहबर मेरा भी है

बेबफा तुझसे बिछड़कर हाले दिल अब क्या कहें
जो उधर है हाल तेरा वो इधर मेरा भी है

मुंतज़िर होना नहीं खलता है हमको अब सनम
वक़्त का पाबंद तुझ सा मुंतजर मेरा भी है

दूध पीने की खबर पर यूँ पुजारी कह पड़े
संग में रब है मगर कुछ तो हुनर मेरा भी है

टूट कर बिखरा हुआ इक आइना इतरा रहा
शहरे बुत में हो रही हलचल असर मेरा भी है

ज़ुल्म से झुकना नहीं अच्छा मगर सच है यही
इन झुके सारे सरों में एक सर मेरा भी है

मौत से डरता नही हूँ क्यूंकी मुझको है पता
उस परिस्ताँ मे कहीं तो एक घर मेरा भी है

मैं हूँ साया पर कहीं मिट जाऊं न तूफान में
"दीप" जो है दिल मे तेरे वो ही डर मेरा भी है

संदीप पटेल "दीप"

मौलिक, अप्रकाशित

Views: 472

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Comment by vijay nikore on March 18, 2013 at 11:06am

अच्छी गज़ल के लिए बधाई, संदीप जी

 

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 8:47pm

टूट कर बिखरा हुआ इक आइना इतरा रहा
शहरे बुत में हो रही हलचल असर मेरा भी है

ज़ुल्म से झुकना नहीं अच्छा मगर सच है यही
इन झुके सारे सरों में एक सर मेरा भी है..

इन शेरों पर विशेष बधाई.. वैसे कोशिश अच्छी हुई है.  लेकिन कई अश’आर और निखर सकते थे.

Comment by Savitri Rathore on March 15, 2013 at 5:16pm

संदीप जी, एक अच्छी ग़ज़ल प्रस्तुति !
झूठ की गलियों में सच तक का सफ़र मेरा भी है
है ज़रा मुश्किल मगर रब राहबर मेरा भी है
बधाई स्वीकारें।

Comment by Yogi Saraswat on March 15, 2013 at 12:05pm

मुंतज़िर होना नहीं खलता है हमको अब सनम
वक़्त का पाबंद तुझ सा मुंतजर मेरा भी है

दूध पीने की खबर पर यूँ पुजारी कह पड़े
संग में रब है मगर कुछ तो हुनर मेरा भी है

टूट कर बिखरा हुआ इक आइना इतरा रहा
शहरे बुत में हो रही हलचल असर मेरा भी है

बढ़िया ग़ज़ल है संदीप जी !   एक एक अश'आर अपने आपमें पूर्ण ! बहुत बेहतरीन

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 15, 2013 at 8:12am
अच्छी ग़ज़ल हुई है संदीप जी ! दाद कुबूल करें।
Comment by विजय मिश्र on March 14, 2013 at 3:26pm

ज़ुल्म से झुकना नहीं अच्छा मगर सच है यही 
       इन झुके सारे सरों में एक सर मेरा भी है | " .............  बहुत प्यारी सी बात और बहुत ही प्यारे लहजे में . रब की रहबरी का क्या कहना . बधाई .

Comment by Dr.Ajay Khare on March 14, 2013 at 3:21pm

ज़ुल्म से झुकना नहीं अच्छा मगर सच है यही 
इन झुके सारे सरों में एक सर मेरा भी है sandeep ji aapki in lines mai bahut bada sach chupa hai sir aap mahan hai 

ham aapki santaan hai badhai

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