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(मौलिक व अप्रकाशित रचना)

दिनकर रश्मियाँ मार्ग खोजती
चली शनैः शनैः वसुन्धरा पथ
तिमिर अकङता जकङे रहता
जोर लगाता वसुन्धरा ललाट
आलोक को विलोक तिमिर
विस्मृत करता स्वबल शक्ति
दिनकर रश्मियाँ पहुँच वसुन्धरा
मानव मानस भाव उपजाती
रमणी वसुन्धरा श्रृंगारित होती
केश मोगरा पुष्पदल सजाती
केसर मिश्रित टीका लगाती
कर्ण हरसिंगार फूल पहनती
मस्तक ओढे धानी चुनरिया
सप्तरंगी पुष्पमाल उर सुशोभित
कलाई गुलाबी कंगना डारे
हस्त गेंदा पहरे हथफूल
कमलदल करधनी कमर कसी
तन केसरिया वसन जो पहना
दिनकर रश्मियाँ आकर्षित सी
खिंची जाती वसुन्धर ओर
द्वारे खङी वसुन्धरा रमणी
स्वागत करने दिनकरी रश्मियों का
वसुन्धरा सुत सुता हर्षित
कोयल गाये नवमंगल गीत
मयूर सुन्दर नृत्य दिखलाये
हर्षित भौंरे ताल मिलाएं
तितलियाँ मयूर संग लगाए ठुमके
गुलाब पंखुङियाँ करताल करे
दिनकर रश्मियाँ हुईँ उल्लासित
मनभावन स्वागत मान मिला
मानव मानस आनन्दित मगन
मनाया वसन्तागमन पर्व हर्षित
झूमा वसुन्धरा परिवार सकल
स्वागत ऐसा वसन्तागमन का
हुआ वसुन्धरा रमणी द्वारा।

- सतवीर वर्मा 'बिरकाळी'

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Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 18, 2013 at 8:09am
आ॰ सौरभ पाण्डे जी, छन्द विधान से अनभिज्ञ हूँ। इसलिए जैसे भी होता है लिख लेता हूँ। भविष्य में शायद ज्ञान हो जाए। आपकी उचित सलाह पर विचार करुँगा।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 8:34pm

आशा है, आप ऐसी रचनाओं से बचने का प्रयास करेंगे.

ऐसी रचनाओं के होने के भावों को कृपया छंदबद्ध करने का प्रयास करें. प्रयासरत होने में कोई बुराई नहीं है.

Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 16, 2013 at 7:52am
सुन्दर प्रतिक्रिया कर प्रोत्साहन करने के लिए आभार आ॰ योगी सारस्वत जी।
Comment by Yogi Saraswat on March 15, 2013 at 11:57am

कोयल गाये नवमंगल गीत
मयूर सुन्दर नृत्य दिखलाये
हर्षित भौंरे ताल मिलाएं
तितलियाँ मयूर संग लगाए ठुमके
गुलाब पंखुङियाँ करताल करे
दिनकर रश्मियाँ हुईँ उल्लासित
मनभावन स्वागत मान मिला

बहुत सुन्दर !

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