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सार/ललित छंद

सार/ललित छंद (16+12मात्रायें:- छन्नपकैया की जगह "आई होली छाई होली," का प्रयोग)



आई होली छाई होली, पवन चली मतवारी

रंग लगाते झूम झूम के, मस्त हुए नर नारी



आई होली छाई होली, रंग उड़े सतरंगी

भंग चढ़े है सर पे सबके, होती है हुड़दंगी



आई होली छाई होली, बुरा कोई न माने

रंगों का मौसम ये प्यारा, आता प्रीत बढ़ाने



आई होली छाई होली, भर भर के पिचकारी

कान्हा रंगों को बरसाते, भीगे राधा प्यारी



आई होली छाई होली, यौवन की ले हाला

रंग चटक… Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 21, 2013 at 12:43pm — 6 Comments

कोयल दीदी! (सार छंद)

कोयल दीदी! कोयल दीदी! मन बसंत बौराया।

सुरभित अलसित मधु मय मौसम, रसिक हृदय को भाया॥



कोयल दीदी! कोयल दीदी! वन बंसत ले आयी।

कूं कूं उसकी बोली प्यारी, हर जन मन को भायी॥



कोयल दीदी! कोयल दीदी! बागों में फूल खिले।

लोभी भौंरे कलियों का भी, रस निर्दय चूस चले॥



कोयल दीदी! कोयल दीदी! साजन घर को जाओ।

मुझ विरहा की विरह वेदना, निष्ठुर पिया सुनाओ॥



कोयल दीदी! कोयल दीदी! कू कू करके गाए।

जग में मीठी बोली अच्छी, राग द्वेष मिट जाए॥



कोयल… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 21, 2013 at 12:42pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मैं, तुम और वे क्षण

वातायन निर्वाक प्रहरी था,

बाहर मस्त पवन था

अंदर तो ‘बाहर’ निश्चुप था,

अंतर में एक अगन था.

कितने ही लहरों पर पलकर,

कितने झोंके खाकर

कितने ही लहरों को लेकर,

कितने मोती पाकर –

मैं आया था शांत निकुंज में.

मैं आया था शांत निकुंज में,

एक तूफ़ाँ को पाने

एक हृदय को एक हृदय से,

एक ही कथा सुनाने.

पर निकुंज की छाया में

थी तुम बैठी उद्भासित सी,

थोड़ी सी सकुचायी सी

और थोड़ी सी घबरायी सी.

स्तब्ध रहे कुछ पल

हम दोनों, पलकों…

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Added by sharadindu mukerji on March 21, 2013 at 3:47am — 11 Comments

उलझन

लुढ़क के वहीं आ खड़ी हुई ज़िंदगी

जहाँ थे कभी खड़े,

कदम थे कितने नपे तुले

किस राह पर , कहाँ फिसल के रह गये.

मुड़कर देखना क्या ?

सोच के पछ्ताना क्या ?

हवा भी कुछ ऐसी बही,

चट्टान ढलान में ठहरता क्या ?

दूर दूर तक था रेगिस्तान

नैनों में कितने रेत पड़े,

आँसू किसके बहकर रहे

अतीत के या आने वाले कल के.

फूलों पर चलते थे कभी -

कब पंखुड़ियाँ रह गये मुरझा के,

एक शुष्क पात भी नहीं रहा

देखूँ जिसे कभी नज़र भर के.

जिधर भी गये हाथ…

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Added by coontee mukerji on March 20, 2013 at 9:50pm — 7 Comments

आँसू

आँखों से मेरी छलक पड़ते हैं आँसू।

दिल में ज़ख्म बनकर  हँसते हैं आँसू।।

ग़म से जब दिल बेज़ार होता है,

ऐसे हाल में मुस्कुराना भी बेकार होता है,

तभी मोती बनकर चमकते हैं आँसू।

आँखों से मेरी छलक पड़ते हैं आँसू।।

बुरे वक़्त का दर्द सीने में छुपाया नहीं जाता,

क्या करें,जब किसी को ये बताया नहीं जाता,

यही दर्द के मोती बनकर चमकते हैं आँसू।

आँखों से मेरी छलक पड़ते हैं आँसू।।

इस दर्द को सीने में संभालना होता है मुश्किल,

इस बाढ़ को बढ़ने से रोकना होता है…

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Added by Savitri Rathore on March 20, 2013 at 8:57pm — 13 Comments

!!जय हिन्द!!

!!जय हिन्द!!

दुइ-दुइ आॅख करो तो करो तुम
कायरता में छिपाओ नहिं
नजरिया।


दुइ-दुइ हाथ करो तो करो तुम
घमण्ड में सुनाओ नहिं
बड़बतिया।


दुइ-दुइ कृपाण रखो तो रखो तुम
दो धार रखाओ नहिं
कटरिया।


इक-इक कदम बढ़ो तो बढ़ो तुम
गुमराह कर दिखाओ नहिं
चैारहिया।


सत्यम इक धर्म चलो तो चलो सब
वतन खिलाफ बढ़ाओ नहिं
मजहबिया!
के0पी0सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 20, 2013 at 8:36pm — 5 Comments

खुली किताब ( OPEN BOOK )

(  ये कविता सूरज को दीपक दिखाने के बराबर है फिर भी मेरी तरफ से  ओबीओ के सम्मान मे एक तुच्छ सी भेट,   )

 

खुली किताब ( OPEN BOOK )

 

ये खुली किताब है बडी अनोखी, है गद्य-पद्य रचना की…

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Added by बसंत नेमा on March 20, 2013 at 5:00pm — 1 Comment


सदस्य कार्यकारिणी
(होली) इक दूजे पर डालिये ,पुष्प रंग के घोल

मौसम में भी मच रही, फागुन की अब धूम|

झूमें हँस-हँस मंजरी, भँवरे जाते  चूम||

 

डाल-डाल पर खिल रहे,केसर टेसू फूल|

आपस में घुल मिल गए ,बैर भाव को भूल||

 

महकी डाली आम की,मादक-मादक भोर|

लिखती पाती प्रेम की,होकर मस्त विभोर||

 

कान्हा को फुसला रही,फागुन प्रीत बयार|

राधा जी को भा रही,स्नेहिल रंग फुहार||

 

चन्दा ने फैला दिया,चाँदी भरा रूमाल|

सूरज ने बिखरा दिया,पीला ,लाल गुलाल||

 

क्यारी-क्यारी दे…

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Added by rajesh kumari on March 20, 2013 at 4:32pm — 10 Comments

dohe

गंगा जमुना  भारती ,सर्व  गुणों की खान
मैला करते नीर को  ,यह पापी इंसान .

सिमट रही गंगा नदी ,अस्तित्व का सवाल
कूड़े करकट से हुआ ,जल जीवन बेहाल .

गंगा को पावन करे  , प्रथम यही अभियान
जीवन जल निर्मल बहे ,सदा करे  सम्मान .
--- शशि पुरवार

Added by shashi purwar on March 20, 2013 at 4:08pm — 12 Comments

अनाम रिश्ते

कुछ रिश्ते अनाम होते हें

बन जाते हें

यूँ हीं, बेवजह, बिना समझे

बिना देखे, बिना मिले ....

महसूस कर लेते हें एकदूजे को

जैसे हवा महसूस कर ले खुशबु को

मानो मन महसूस कर ले आरजू को

मानो रूह महसूस कर ले बदन…

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Added by Amod Kumar Srivastava on March 20, 2013 at 2:00pm — 7 Comments

ईचक दाना बीचक दाना (सार छंद)

(सार / ललित छंद16+12मात्रायें:- छन्नपकैया छंद पर एक प्रयोग )



ईचक दाना बीचक दाना,होली होली प्यारी।

भर पिचकारी साजन मारी,रंगी सारी सारी॥

ईचक दाना बीचक दाना,उड़ता रंग अबीरा।

हुलियारों की टोली आयी,गाते फाग कबीरा॥

ईचक दाना बीचक दाना,भंग चढ़ी अब हमको।

प्रेम पर्व होली है भाई,रंग दूँगा मैं सबको॥

ईचक दाना बीचक दाना,गुझिया हलवा पूरी।

गुलगुल्ला और छने जलेबी,खाये धनिया झूरी॥

ईचक दाना बीचक दाना,दादा दादी छुपकर।

छक्कर पीते भंग झूमते,रंग खेलते… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 20, 2013 at 11:00am — 2 Comments

ग़जल/ पिघल गया होगा

जब जिक्र मेरा हुआ होगा

वो कुछ पिघल तो गया होगा

 

जी भर तुझे देख ही लेता

ओझल कहीं हो गया होगा

 

अब सांस भर जी नहीं सकते

इस शहर में कुछ धुंआ होगा…

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Added by बृजेश नीरज on March 19, 2013 at 8:02pm — 12 Comments

हे! गंगा मॅा !!!

चतुष्पदी ,चैापैया.(10, 8, 12 अन्त में दो गुरू)

जय पाप नाशनी जीवन दानी जन मानस हितकारी!

शंकर शीश जटा उलझी सुलझी जस महदेव विचारी!!

कॅापें दिश देवा भय सब भावा सुलोक विस्मयकारी!

श्री शंभु पुरारे नाथ हमारे धावत दीनन वारी!!1



रस रस कर धारा विष तन सारा अमृत चरनहि सुखारी!

तुम दीन दयाला चॅंद सो हाला देवन की महतारी!!

हे!सुरसरि माता दुख हर जाता आवत शरण तिहारी!

तुम जाति धर्म नहि अवगुण जानहि फल जनत बिन…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 19, 2013 at 7:10pm — 7 Comments

होली का त्यौहार, इंद्र की धनुही ताके ||

मौलिक अप्रकाशित

धनुही ताके फाग में, आसमानि सुनसान |

नीलकंठ नीलांग को, बैंगनिया पकवान |



बैंगनिया पकवान, सभी को चढ़ी हरेरी |

पीले…

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Added by रविकर on March 19, 2013 at 5:34pm — 1 Comment

बम बम बलवाना बम बम!

जामवंत ने याद दिलाया, सारी शक्ति पास बुलाया!

तुम हो धीर वीर बलवाना, तुम्हरे गुरू सूर्य भगवाना!!

पवन पुत्र तुम वेगि समाना, इन्द्रादि सब करे प्रनामा!

तुम्ह सागर को तालहि मानो, आप ही सकल बृह्महि जानो!1 बम बम..

काल कूट हर अमृत धारो, भूत प्रेत पटक कर मारो!

तुम हो अटल ज्ञान के राशी, दुष्ट दानव सबके गल फाॅसी!!

तुम हो सब संकट से पारा, सब गुन आगर करो विचारा!

लॅाघि करो तुम सागर पारा, जयति राम श्री राम पुकारा!!2 बम…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 19, 2013 at 10:21am — 8 Comments

भगवान का अस्तित्व ......?

जिन्दगी एक कठपुतली सी है

जिसकी डोर .....

वो जो ऊपर बैठा है

उसके हाथो में है

वो जो दीखता नही

मगर है तो सही .....

कोई कहता है कि

भगवान नही हैं 

और कोई…

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Added by Sonam Saini on March 19, 2013 at 9:30am — 7 Comments

चलो घर की ओर! Copyright©

घोंसलों से पलायन करते परिंदे

आकाश की ऊँचाई नापने निकलते हैं

पंख फैलाने की सीख घर से लेके

मदमस्त गगन में उड़ते हैं

जहाँ दाना देखा उतर जाते

फिर नये झुंड के साथ , नयी दिशा में मुड़ जाते



नीले गगन की सैर, इंद्रधनुष की अंगड़ाई में लीन

कभी आसमान में स्वतंतरा, कभी हवा के बहाव के आधीन

घोंसले की गर्मी और मा के दुलार को भूल

नये चेहरों को आँखटे, उनके संग हो…

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Added by अनुपम ध्यानी on March 19, 2013 at 12:10am — 1 Comment

बन्द पड़े-से लॉकर हैं सब - ग़ज़ल

अपने अपने भीतर हैं सब

चिेकने-चुपड़े बाहर हैं सब



किस की प्यास बुझा पाएँगे

इ्क टूटी-सी गागर हैं सब



कौन समझ पाएगा इनको

बस…

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Added by shyamskha on March 18, 2013 at 10:00pm — 5 Comments

दुर्मिल सवैया

जब पाप कियो तुम भोर भये, दिन रात भला तुम का करिहो!

सब नाचत - गावत ताल दियो, तुम ताल तलैयन डूब रहो!!

फिर गंग तरंग बहे न बहे, रखि आपन मान बढ़ाय रहो!

इत डारि रहे खर-मैल बढे, उत गंग कषाय बढ़ाय रहो!!1

नित डारत हैं मल नालन कै, नहि दूसर देखि उपाय रहो!

तुम बालक गंग तरंगिनि कै, कलि कालहि मातु लजाय रहो!!

अब तो सिर सौं तुम लाज करो, यह देश तुझे ललकार रहो!

तुम शान कमान धरे उर मा, गण मान कहाय लुकाय रहो!!2

अपनी छतरी अपने लड़के, नहि होत सहाय तलाड़…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 18, 2013 at 9:52pm — 6 Comments

व्यंग्य कविता

इक और व्यंग्य कविता पसंद आई के नही बताना जी 

  इस बस्ती में भेडियें रहते उनको बाहर निकाले कौन,

   सब के घर अब शीशे के है पत्थर क्यों उछाले कौन।

   इकलौते बेटे नें माँ बाप को ही घर से निकाल दिया,

   वृद्धआश्रम में भी गद्दारी है बुजुर्गों को सम्भाले कौन। 

   नामी गुंडे इश्तयारी मुजरिम देखो जेल मंत्री बन बैठे,

   चोरों का जब राज हो गया देखे गा अब तालें कौन। 

   महंगाई पे निरन्तर चढ़े जवानी ऊंचा उंचा कूद रही,

   सारथी जब अनजान हुआ…

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Added by rajinder sharma "raina" on March 18, 2013 at 4:00pm — 1 Comment

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