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गजल#(आज के दिन पर)

22  22  22  22
मूर्खों का सम्मेलन हो फिर,
बीतीं बातें,चिंतन हो फिर।1

उम्र हुई तो क्या होता है
सुन्नत,चाहे मुंडन हो फिर।2

अपने तर्क उठाते रहिये
औरों का बस खंडन हो फिर।3

जात-धरम अवसाद हुए कब?
मुँहदेखी हो,मंडन हो फिर।4

भाषा,भनिति अबला जैसी
नाच नचा लें,ठन-ठन हो फिर।5

पीठ नहीं पूजी जाये तो
चलते-फिरते अनबन हो फिर।6

पढ़ने से परहेज भला है
मतलब कुछ हो, लेखन हो फिर।7

नंग-धड़ंग चुहलबाजी हो,
अपनी दुनिया लंदन हो फिर।8

हो लें आज पुरस्कारी तो
वाणी अपनी खन खन हो फिर।9
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Harash Mahajan on April 7, 2018 at 11:14am

आदरणीय मनन जीआदाब, अच्छी गजल के लिए हार्दिक बधाई ।

सादर !

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on April 6, 2018 at 5:23am
आदरणीय मनन कुमार जी खूबसूरत व्यंग्य ग़ज़ल कहने के लिये बहुत बहुत बधाई।
Comment by Manan Kumar singh on April 5, 2018 at 8:14am

आभारी हूँ आदरणीय।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 4, 2018 at 11:09pm

आ. भाई मनन जी, सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Manan Kumar singh on April 4, 2018 at 9:43pm

आदरणीय बसंत जी,आपका आभार।

Comment by Manan Kumar singh on April 4, 2018 at 9:43pm

आभारी हूँ आदरणीय बृज जी।

Comment by Manan Kumar singh on April 4, 2018 at 9:42pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय जी।

Comment by Manan Kumar singh on April 4, 2018 at 9:42pm

आपका आभार आदरणीय आरिफ जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 4, 2018 at 5:22pm

अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय..सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 4, 2018 at 12:29pm

वाह वाह बहुत सुंदर गजल हुई 

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