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डगर कठिन है
मंजिल से पहले पग रुकता है
फिर हौसलों के सहारे
एक-एक पग आगे बढता हूँ
गिरता हूँ, संभलता हूँ
क्या?
मंजिल भी
मेरे इस परिश्रम को देख रही होगी
क्या?
वह भी जश्न मनायेगी
मेरे वहाँ पहुँचने पर
कभी-कभी
ये उत्कण्ठा भी उत्पन्न हो जाती  हैं
फिर विचार आता है!
मंजिल जश्न मनाये या ना मनाये
उसे पा तो लूँगा, उसे चुमूँगा
दुनिया को दिखाउँगा कि
इसी के लिए मैने अथक प्रयास किया है
और अनवरत ही चलता रहता हूँ
इक-इक पग बढाते हुए।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 475

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on March 23, 2015 at 12:44am

आदरणीय पवन कुमार जी, इस सुन्दर प्रयास और सुन्दर रचना पर आपको हार्दिक बधाई ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 21, 2015 at 9:20am

बहुत सुंदर आदरणीय पवन कुमार जी बहुत बहुत बधाई

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 21, 2015 at 3:54am
सराहनीय , आदरणीय पवन जी, बधाई, सादर।
Comment by maharshi tripathi on March 20, 2015 at 6:17pm

बहुत सुन्दर ,हार्दिक बधाई आपको आ. Pawan Kumar जी |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 20, 2015 at 5:29pm

प्रिय पवन  !

क्या सुन्दर भाव बिखेरा है  . यह हौसला है तो मंजिल जरूर मुस्कराएगी .  स्नेह .

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 20, 2015 at 2:22pm

बहुत सुन्दर!सराहनीय!मन के भावों को बुनते रहिये धीरे-धीरे और निखार आएगा!

Comment by Shyam Mathpal on March 20, 2015 at 10:47am

सुंदर प्रयास .बधाई.

Comment by Shyam Narain Verma on March 20, 2015 at 10:40am

बहुत सुंदर रचना बधाई आपको

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