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गज़ल -12( जब मुल्क़ में नफ़रत का ये बाजार नहीं था)

221--1221--1221--122
जब मुल्क़ में नफऱत का ये बाज़ार नहीं था
हर शख़्स लहू पीने को तैयार नहीं था //१

अब बाढ़ सी आई है शबे ग़म की नदी में
जब तुम न थे दिल में तो ये बेज़ार नहीं था//२

जो देश की सरहद पे सदा ख़ून बहाए
क्या देेेश की मिट्टी से उन्हें प्यार नहीं था//३

मिट जाएं सभी जंग में हिन्दू व मुसलमाँ
ऐसा तो मेरे हिन्द का त्यौहार नहीं था//४

जब मुल्क़ परेशां था फिरंगी के सितम से
मिल जुुल के लड़े मुल्क ये लाचार नहीं था//५

-- क़मर जौनपुरी

(मौलिक अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2018 at 7:23pm

आ. भाई कमर जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on December 5, 2018 at 2:31pm

हार्दिक बधाई आदरणीय क़मर जौनपुरी जी।बेहतरीन गज़ल।

मिट जाएं सभी जंग में हिन्दू व मुसलमाँ
ऐसा तो मेरे हिन्द का त्यौहार नहीं था//४

Comment by राज़ नवादवी on December 3, 2018 at 7:30pm

आदरणीय क़मर जौनपुरी साहब आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें, सादर. 

Comment by क़मर जौनपुरी on December 2, 2018 at 5:42pm

बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब समर कबीर साहब इस्लाह और हौसला आफ़ज़ाई के लिए।

Comment by Samar kabeer on December 2, 2018 at 5:35pm

जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

तीसरे शैर के दोनों मिसरों में तनाफ़ुर है,'मुल्क' की जगह "देश" कर लें ।

'  हम मिल के लड़े मुल्क ये लाचार नहीं था'

इस मिसरे में तनाफ़ुर है,यूँ कर लें:-

'  मिल जुल के लड़े मुल्क ये लाचार नहीं था'

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