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Ghazal-Dil mein chand pal rab ko reejhanaa bhee hotaa thaa.

दिल में चंद पल तन्मय रब रीझाना भी होता था।
हरिक आबाद घर में एक वीराना भी होता था।।

ि
तश्नगी से सहरा में तूं पी करते मर जाना भी होता था ।
हैरतअंगेज गजाला-गजाली सा याराना भी होता था ।।

वादाफर्मा को वादा निभाना भी होता था ।
दिले-नाशाद को जाके मनाना भी होता था ।।

आजकल गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं लोग ।
पहले अपना मजहबीं इक बाना  भी होता था।।

अब तो अजीजों का हमें सही पत्ता नहीं मिलता।
किसी जमाने में दुश्मन का भी ठिकाना भी होता था ।।

अब न किसी की मंजिले-मकसूद हैं न कोई रहगुजर ।
तीरे-अर्जुन मानिंद मछली पे अचूक निशाना भी होता था ।।

काम निकलते ही अक्सर हवा हो जाते हैं लोग ।
कभी एहसान के बदले नजर शुक्राना भी होता था ।।

वो भी क्या दिन थे माॅं का लौरी सुनाना भी होता था ।
हर जिद्द को पूरी कर मुझे मनाना भी होता था ।।

मुझे खिला-पिला के स्कूल भिजवाना भी होता था ।
माॅं के हाथों सजना-संवरना नहाना भी होता था ।।

अब तो गिडगिडाने के अलावा कोई चारा नहीं ।
माॅं के आगे हकलाना तुतलाना भी होता था ।।

अब तो आंसूओ से कभी हो जाते हैं नम बिस्तर ।
माॅं खुद भीगे सूखे हमें सुलाना भी होता था ।।

अब तो अपने बाजूओं से काम चला लेते हैं।
कभी उनकी जांघों पे सिरहाना भी होता था।।

औलाद को गोद में बुजुर्गो के सामने ।
खुदी को उठाते चंदन शरमाना भी होत था।।

नेमीचन्द पूनिया चन्दन

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