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इस प्यार को सदा ही निभाते रहेंगे हम

२२१ – २१२२ -१२२१ -२१२
इस प्यार को सदा ही निभाते रहेंगे हम
दुश्वार रास्ता हो भले पर चलेंगे हम
सच बोलने के साथ में हिम्मत अगर रही
फिर फूल की तरह ही सदा वस खिलेंगे हम
जब सांस थी तो कर्म न अच्छा कभी किया
इक आग जुर्म की है जिसे अब सहेंगे हम
तरकीब जिन्दगी में अगर काम आ गई
मुंह आईने में देख के परदे सिलेंगे हम
है चैन जिन्दगी में कहाँ ढूँढ़ते फिरें
दिन रात के हिसाब में उलझे मिलेंगे हम
मैली करो न सोच खुदा से जरा डरो
टेढ़ी नजर हुई तो कहाँ फिर बचेंगे हम
अपनी सुनी गई जो अदालत में देख लो
“तन्हा” कसम खुदा की सदा सच कहेंगे हम

.
मुनीश “तन्हा” नादौन
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 4, 2017 at 2:08pm
जनाब मुनीश तन्हा साहिब ,ग़ज़ल की अच्छी कोशिश ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं। शेर 2 उला मिसरे में अगर रही को रही अगर कर लीजिए ,आपने ग़ज़ल में क़ाफिये सही नहीं लिए ,देखियेगा ---/
(रहेंगे,सहेंगे,कहेंगे ),चलेंगे ,(खिलेंगे,सिलेंगे,मिलेंगे ), बचेंगे ---

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2017 at 6:23pm

आदरणीय मुनीश भाई , अच्छी गज़ल कही है , बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on September 2, 2017 at 5:45am
आदरणीय मुनीश तन्हा जी ने आदाब, शे'र दर शे'र के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए क़ाफ़िया बन्दी पर जनाब समर साहब की बात का संज्ञान लें।
Comment by Samar kabeer on September 1, 2017 at 3:33pm
जनाब मुनीष तन्हा जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।
दूसरे शैर के ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखिये 'अगर रही'
Comment by Mohammed Arif on September 1, 2017 at 11:14am
आदरणीय मुनीश तन्हा जी ने आदाब, शे'र दर शे'र के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।
Comment by PHOOL SINGH on August 31, 2017 at 4:03pm

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