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हुई भोर ( कविता)

हो रहा कलरव श्यामा का  

उठो देखो बाहर 

सूर्य उठा रहा चादर 

हो रही है भोर 

नारंगी नभ से खिलता 

बादलों को चीरता हुआ 

कह रहा है हमसे 

हो रही है भोर 

पत्तों पर ओस शर्माती 

देख सूर्य की किरणे 

खुद को समेटती कहते हुए 

हो रही है भोर 

मिट्टी की सौंधी सी महक 

कलियों का खिलना 

धुप देख मुस्कुराना कहता है 

हो रही है भोर 

उठो छोडो बिस्तर अब तो 

देखो बाहें फैलाये खड़ा नभ है 

और पुकार रही सुबह की बेला 

हो रही है भोर 

मौलिक और अप्रकाशित 

 

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 9, 2017 at 8:09pm

आदाब आदरणीय समर भाई जी , आपका कहना उचित है , मैं दोनों ही चीजो को दर्शा रही थी की सूरज के आने के बाद चाँद और तारे उसकी रौशनी से ओज़ल हो जाते हैं , गर यह भाव यहाँ गलत हो रहा है तो कुछ और सोचती हूँ | सादर |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 9, 2017 at 8:05pm

धन्यवाद आदरणीय शहजाद भाई |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 9, 2017 at 8:05pm

धन्यवाद् आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी | 

Comment by Samar kabeer on August 9, 2017 at 6:40pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,कविता का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
जब सूरज ने चद्दर उठा दी तो उसके बाद चाँद तारों का क्या ज़िक्र,सूरज उसी समय चादर उठाता है जब चाँद तारे आकाश से ग़ायब हो जाते हैं,तार्किकता की दृष्टि से कविता बहुत कमज़ोर है, देखियेगा ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 9, 2017 at 6:12pm
भोर का बढ़िया पेनोरमा पेश किया है आपने। सादर हार्दिक बधाई आदरणीय कल्पना भट्ट जी।
Comment by Mohammed Arif on August 9, 2017 at 8:33am
आदरणीया कल्पना भट्ट जी आदाब, प्रात:कालीन बेला का बहुत ही सादगीपूर्ण चित्रण किया है आपने ।हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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