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कालिख: लघुकथा :हरि प्रकाश दुबे

“सुन कमला, सारा काम निपट गया या अभी भी कुछ बाकी है!”

नहीं ‘मेमसाहब’ सब काम पूरा कर दिया है, दाल और सब्जी भी बना के फ्रिज मैं रख दी है, आटा भी गूंथ दिया है, साहब आयेंगे तो आप बना कर दे दीजियेगा !

“अरे बस जरा सा ही काम तो बचा है, कमला,ऐसा कर रोटी भी बना कर हॉट केस मैं रख जा !”

“मेमसाहब मुझे देर हो रही है, घर पर बच्चे भूखे होंगे !”

अरे चल पगली १५ मिनट में मर थोड़ी ही जायेंगे, चल जल्दी से बना दे !

गरीबी चाहे जो न करवा दे, कमला ने बड़े अनमने ढंग से रोटी बना दी और चलने लगी, तभी ! अरे कमला  शाम को टाइम पर आ जाना -‘मेमसाहब’ ने कहा !

शाम को कमला आयी और उसके साथ उसका पति भी चला आया, और आते ही बोला," ‘मेमसाहब’ कल से कमला आपके यहाँ काम करने नही आयेगी !”

इतना सुनते ही ‘मेमसाहब’ भड़क गयीं और बोलीं " क्यों तन्खाव्ह कम पड़ रही है क्या?”

नहीं-नहीं  , हमारी अपनी कुछ समस्या है- कमला के पति ने कहा !

" क्या तकलीफ है ? कुछ पैसा वगेहरह चाहिये तो बताओ, बाद में इसकी पगार से काट लूंगी !”

नहीं ‘मेमसाहब’ अब आप तो दूसरी कामवाली ढूंढ लीजिये !”

"अरे भाई तकलीफ बताये बगैर मे तुम्हें काम नही छोड़ने दुंगी, बोल क्या तकलीफ है?”

कमला का पति बोला " आप जिस तरह अपने पति को डांटती फटकारती रहती हो , यह देख देखकर ये भी यह भी सब सीखने लग गई है , मेरे मे साहब जितनी सहनशक्ति नही है, जिससे इस बेचारी को रोज मार खानी पड़ती  है, अब तो बच्चों पर भी इसका असर पड़ने लगा है, मुझे मेरे घर मे और अशांति नही चाहिए !”

मेमसाहब’ के मुहँ पर कोई कालिख पोत गया था !

 

"मौलिक व अप्रकाशित"

© हरि प्रकाश दुबे

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Comment by khursheed khairadi on July 29, 2017 at 9:09am
आदरणीय हरी सर , बहुत सटीक लघुकथा है।संभ्रांत वर्ग के नैतिक पतन को उजागर करती हुई रचना है। बहुत बहुत बधाई सर।
Comment by Mohit mishra (mukt) on July 26, 2017 at 12:13am

वर्तमान परिदृश्य को शब्दबद्ध करने का बहुत रचनात्मक कार्य किया है आपने आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी | 

Comment by Nita Kasar on July 25, 2017 at 9:15pm
सार्थक,संदेशप्रद कथा के लिये बधाई आद० हरिप्रकाश दुबे जी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 25, 2017 at 8:51pm
बेहतरीन सृजन। सादर हार्दिक बधाई आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी।
//बोल क्या तकलीफ़ है? // का अप्रत्याशित जवाब पढ़ कर पाठक चौंक जाएंगे। जवाब कुछ और भी हो सकता था उसी प्रवाह को बरकरार रखते हुए। लेकिन यह कालिख पूर्ण करारा व्यंगात्मक/कटाक्षपूर्ण जवाब भी रोचक व विचारोत्तेजक है। फिर भी समापन पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
Comment by Samar kabeer on July 25, 2017 at 6:17pm
जनाब हरि प्रकाश दुबे जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by TEJ VEER SINGH on July 25, 2017 at 1:46pm

बेहतरीन संदेश प्रद रचना आदरणीय हरि प्रकाश जी। हार्दिक बधाई।

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