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दिल्ली में सूरज: कविता :हरि प्रकाश दुबे

दिल्ली में भी

सूरज उगता है

शहादरा में

काले धुएं की, ओट से

धीरे –धीरे संघर्ष करते

ठीक उसी तरह जैसे

माँ के गर्भ से कोई

बच्चा निकलता है

बड़ा होता है

बसों और मेट्रो में

लटक –लटक कर

धक्के खा-खा कर

जीवन जीना सीखता है

पसीने को पीता जाता है

पर थक हार कर भी

जनकपुरी की तरफ बढ़ता जाता है

रक्त से लाल होकर

वहीँ कहीं किसी स्टाप पर

चुपके से उतर जाता है

पर, सूरज का जीवन संघर्ष

सिर्फ वही देख पाते हैं

जो दिल्ली में, जल्दी उठ जाते हैं

या अँधेरा होने से पहले

अपने घर पहुँच जाते हैं !!

 

"मौलिक व अप्रकाशित"

© हरि प्रकाश दुबे

 

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Comment

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Comment by Samar kabeer on July 25, 2017 at 6:37pm
जनाव हरि प्रकाश दुबे जी आदाब,अच्छी कविता लिखी,अच्छे तंज़ छुपे हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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