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यहाँ के लोग महब्बत शदीद करते हैं

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

ये काम आज के एह्ल-ए-जदीद करते हैं
ग़ज़ल के मुँह पे तमांचा रसीद करते हैं

लगे हुए तो हैं पैहम इसी तग-ओ-दौ में
हमें वो देखिये किस दिन शहीद करते हैं

ये नफ़रतें तो महज़ आरज़ी हैं,सच ये है
यहाँ के लोग महब्बत शदीद करते हैं

मुसालहत की अगर आरज़ू है तुमको भी
तो आओ बैठ कर गुफ़्त-ओ-शुनीद करते हैं

वफ़ा से दूर तलक जिन को वास्ता ही नहीं
ये लोग उनसे इसी की उमीद करते हैं

तू भूल से भी "समर" मेरा ज़िक्र मत करना
वो मेरे नाम से नफ़रत शदीद करते हैं

____

एह्ल-ए-जदीद :- नई बात लिखने वाले
तमांचा रसीद :- चाँटा मारना
पैहम :- मुसलसल
तग-ओ-दौ :- कोशिश
आरज़ी :- कुछ दिन के लिये
मुसालहत :- समझौता
गुफ़्त-ओ-शुनीद :- बात चीत
शदीद :- सख़्त

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on July 12, 2017 at 10:16pm
जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on July 12, 2017 at 10:14pm
जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज'साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on July 12, 2017 at 10:12pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on July 12, 2017 at 10:10pm
जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on July 12, 2017 at 10:08pm
जनाब श्याम नारायण वर्मा जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on July 12, 2017 at 10:06pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 7:34pm

आ. समर सर, बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने. सभी शेर एक से बढ़कर एक हैं. मतला विशेष रूप से पसन्द आया. दिल से ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Sushil Sarna on July 11, 2017 at 4:57pm

वफ़ा से दूर तलक जिन को वास्ता ही नहीं
ये लोग उनसे इसी की उमीद करते हैं

वाह वाह और वाह ... आदरणीय समर कबीर साहिब बहुत ही दिलकश ग़ज़ल बनी है। दिल से मुबारकबाद कबूल फ़रमायने सर।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 11, 2017 at 4:26pm

वाह वा... बहुत शानदार काफ़िया शानदार ग़ज़ल है ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by Ravi Shukla on July 11, 2017 at 2:39pm

आदरणीय समर साहब आदाब बड़े दिन बाद आपका कलाम पढ़ा गजल का निखालिस रंग नजर आया कवाफी खुद खुद ब शेर में आरहे है वाह वाह दिली मुबारक बाद कुबूल करें । सीखने के लिये बहुत कुछ है इस अंदाजे बयां में । सादर

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