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जब नज़र से उतर गया कोई

2122/1212/22
.
जब नज़र से उतर गया कोई,
यूँ लगा मुझ में मर गया कोई.
.
इल्म वालों की छाँव जब भी मिली
मेरे अंदर सँवर गया कोई.
.
उन के हाथों रची हिना का रँग
मेरी आँखों में भर गया कोई.
.
बेवफ़ाई!! ये लफ्ज़ ठीक नहीं,
यूँ कहें!!! बस, मुकर गया कोई.

मौत को “नूर” मौत क्यूँ मानें
मानिए ... अपने घर गया कोई.   
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 790

Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 17, 2017 at 10:08pm
कुछ भी कहिये..बस बहुत ही खूबसूरत है
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2017 at 9:32pm

शुक्रिया आ. अनुराग जी ...
मेरी ग़ज़ल तो मेरे बेवफ़ाई वाले शेर के आसपास बुना हुआ जाल है ...गुप्त साहब की किसी ग़ज़ल से कभी गुज़रना हो नहीं पाया अबतक..
वैसे गुप्त साहब के मतले में एक बहुत बारीक़ विसंगती है ..
.

दिल में ऐसे उतर गया कोई

जैसे अपने ही घर गया कोई..... जब दिल में उतर गया है तो अपने घर आया वाला भाव अधिक सही होता ...कम से कम  मुझे यही लगा ..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2017 at 9:27pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 17, 2017 at 9:27pm

शुक्रिया आ. मोहम्मद आरिफ़ साहब 

Comment by Samar kabeer on April 17, 2017 at 6:32pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on April 17, 2017 at 10:35am
जब नज़र से उतर गया कोई
यूँ लगा मुझमें मर गया कोई । वाह!वाह!! क्या ख़ूब शे'र है ।
उनके हाथों की हिना का रचा रंँग
मेरी आँखों में भर गया कोई ।क्या कहने!क्या कहने!!
शे'र दर शे'र दिली मुबारकबाद आदरणीय नीलेश साहब ।

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