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बीस साल बाद आज जोखन लौटा था गाँव, कितनी बार घरवालों ने बुलाया, कितने प्रयोजन पड़े, लेकिन जोखन ने कभी भी गाँव की तरफ जाने का नाम नहीं लिया था| कितनी बार लोगों ने पूछा, लेकिन कभी उसने वजह नहीं बताया| आज गाँव में आकर उसे सब कुछ बदला बदला लग रहा था, कुछ भी पहचाना नहीं लग रहा था| पिताजी से हाल चाल करके वह गाँव में घूमने निकला और कुछ ही देर में गाँव के बाहर खेतों में खड़ा था| खेत भी अब खेत कम, प्लाट ज्यादा लग रहे थे| खेतों को पार करता हुआ वह बगल के गाँव के रास्ते पर चल पड़ा| कभी पगडण्डी जैसा रास्ता अब कंक्रीट का बन गया था लेकिन उसपर से गुजरने वाले कदम अब कम हो गए थे|
बगल के गाँव में पहुँच कर उसने उस घर की तरफ कदम बढ़ाया जहाँ बीस साल पहले वह आखिरी बार आया था| उस आखिरी बात के बाद कि "हमारा साथ संभव नहीं है, अपनी अलग जिंदगी बसा लो| हाँ मेरी दुआएं हमेशा साथ रहेंगी और तुम जितना आगे बढ़ोगे, मैं भी उतना ही खुश रहूंगी", जोखन ने कभी पलट कर नहीं देखा| इस बात का पता उन दोनों ने आज तक किसी किसी को भी नहीं लगने दिया था|
इस बीच उसे खबर मिलती रही कि रंजू की शादी हो गयी और वह किसी और गाँव में चली गयी| वह भी अपनी जिंदगी में व्यस्त होता गया और अपनी हर तरक्की उसे यह सुकून जरूर देती रही कि रंजू को भी ख़ुशी मिल रही होगी| लेकिन पिछले हफ्ते जो खबर उसे मिली उसने उसके होश उड़ा दिए|
अब तो बस मन में एक इच्छा थी कि एक बार पता चल जाए कि जो खबर उसने सुनी थी वह सच है कि नहीं| बड़ी जद्दोजहद के बाद उसने गाँव आकर एक बार रंजू के घर जाकर पता लगाने का फैसला लिया था| घर में तो वह किसी से पूछ नहीं सकता था इसलिए मन ही मन वह मनाता आया था कि खबर गलत ही हो| आखिर उसकी बात गलत कैसे हो सकती थी, उसकी तरक्की से तो रंजू की खुशियाँ बढ़नी थी| बस दो ही घर बाद उसकी गली आने वाली थी और जोखन का दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि किसी आवाज ने उसको रोका "अरे जोखन, कैसे हो और कब आये, बहुत साल हो गया था तुमको देखे"|
उसने पलट कर देखा, रंजू के पिताजी थे| उनका चेहरा देखते ही उसे सब समझ आ गया, क्या कहे, क्या पूछे, उसके दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया| बस किसी तरह इतना कह कर कि "आज ही आया था चाचा, ठीक हूँ", पलट कर अपने गाँव की तरफ चल पड़ा| पीछे से आती आवाज उसे जैसे सुनाई ही नहीं पड़ रही थी और कुछ भी पूछने की हिम्मत जोखन गँवा चुका था|
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on March 1, 2017 at 5:23pm

बहुत बहुत आभार आ शिज्जु शकूर जी, थोड़ा अधूरापन है, कोशिश करता हूँ दुरुस्त करने की


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 27, 2017 at 11:28am

अच्छी कहानी हुई है आ. विनय जी, जोखन के मनोभावों का अच्छा चित्रण किया आपने। फिर भी कहीं एक अधूरापन सा लग रहा है। 

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