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शराफत रास दुनिया को कहां आती है कहिए भी-ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

वो दिन बेहतर थे जो गुजरे मेरे आवारगी में ही
शराफ़त रास दुनिया को कहाँ आती है कहिये भी

जला डाले सभी सपने ये दुनिया तो सितमगर है
कहाँ पहले कभी बिखरी थी मन पे रात की स्याही

न अब मासूमियत बाक़ी न अब बेफ़िक्री का मौसम
सहर आते थमा देती पिटारी जिम्मेदारी की

न जाने ढूँढता है क्या किधर को जा रहा है मन
भला क्यूँ रास आती ही नहीं दुनिया की ये क्यारी

गज़ब इंसानियत बदली फ़िदा है बस दिखावे पर
नज़र हर आंकती कीमत हुआ हर शख्स व्यापारी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 7, 2017 at 11:01pm
आदरणीय आरिफ साहब बहुत बहुत आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 7, 2017 at 11:00pm
आदरणीय विजय सर सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 7, 2017 at 11:00pm
आदरणीय गिरिराज सर सादर प्रणाम और हार्दिक बधाई
Comment by Mohammed Arif on January 7, 2017 at 10:53pm
आदरणीय पंकज कुमार मिश्राजी, बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाई !
Comment by vijay nikore on January 7, 2017 at 9:49pm

शानदार गज़ल लिखी है आपने। हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 6, 2017 at 1:59pm

आदरणीय पंकज भाई  , बढिया गज़ल कही है , दिली बधाइयाँ स्वीका र करें ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 5, 2017 at 8:40am
आदरणीय महेंद्र जी सादर अभिवादन और आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 5, 2017 at 8:40am
आदरणीय ब्रज साहब शुक्रिया कुबूल फरमाएं
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 5, 2017 at 8:39am
आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 5, 2017 at 8:39am
आदरणीय सुशिल सर सादर अभिवादन और आभार

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