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दुःख बिसराये
सुख को लाये
ऐसा गीत गाऊँ मैं
खट्टी  मीठी यादों को
थोड़ा सा गुन गुनाऊं मैं
दूर खड़ा पर्वत पुकारे
चलकर उसतक जाऊं मैं
बादलों से बरसे पानी
झूम झूम कर नाचूँ मैं
खेत बुलाये, परिंदे पुकारें
बोली उनकी समझूँ मैं
नाच उठे मनवा मेरा
गीत ऐसा कोई गाऊँ मैं |

बहती नदी , बहता झरना
कलकल इनकी सुन लूँ मैं
किनारे से टकराती लहरों से
कुछ देर बातें कर लूँ मैं
देखकर वहां गोरी कलाई
बैठकर कुछ देर निहारूँ मैं
सूरज की तपती किरणों से
कुछ देर लड़ जाऊं मैं |

इतराती तितलियों को देख
मन ही मन खुश हो जाऊं मैं
भंवरों की मधुर गुंजन से
मंत्र मुग्ध हो जाऊं मैं |

सुंदर धरती , नीला अम्बर
कैसे खुद को रोक पाऊं मैं
देखकर हर सुंदर चीज़ को
फिर एक नया गीत गाऊँ मैं |

मौलिक एवं अप्रकाशित



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Comment by rajesh kumari on January 17, 2017 at 10:49pm

प्यारा मासूम सा गीत लिखा है प्रिय कल्पना जी ...बहुत खूब हार्दिक बधाई स्वीकारें 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 4, 2017 at 8:38pm
धन्यवाद आदरणीय डॉ आशुतोष जी ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 4, 2017 at 8:38pm
धन्यवाद आदरणीय जयनित जी ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 4, 2017 at 8:37pm
धन्यवाद आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सर जी ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 4, 2017 at 8:37pm
धन्यवाद आदरणीय विजय निकोरे सर जी ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 4, 2017 at 8:36pm
धन्यवाद आदरणीय गिरिराज सर जी ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 3, 2017 at 10:53pm
आदरणीया या शानदार गीत के लिए ह्रदय से बधाई स्वीकार करें मात्ताओं के लिहाज से जानना चाहता था इस गीत में मात्राएँ किस तरह समायोजित है
Comment by जयनित कुमार मेहता on January 3, 2017 at 8:55pm
आदरणीया कल्पना जी, आपने अपने चेतन में दबी आकांक्षाओं को कविता में पिरोने में सफलता प्राप्त की है। इसके लिए हार्दिक बधाई आपको।
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 3, 2017 at 12:51pm
आदरणीया कल्पना जी सादर अभिवादन, उम्दा गीत पर बधाई आपको
Comment by vijay nikore on January 3, 2017 at 11:21am

मनोरम गीत के लिए बधाई, आदरणीया कल्पना जी। नव वर्ष आपके लिए मंगलमय हो।

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