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दशहरा मिलन (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पिछली रात लेखन कर्म में बिताने की वज़ह से आज बस में लम्बा सफ़र करते समय शेख़ साहब को बार-बार नींद आ रही थी। बस स्टॉप पर पहुंचने पर बस से उतरकर टैक्सी में बैठे ही थे कि ज़ेबों में मोबाइलों व पर्स को टटोला। मंहगा वाला मोबाइल ग़ायब था। बस जा चुकी थी। बस का नंबर तक याद नहीं था। कुछ लोगों ने तुरंत पुलिस को ख़बर करने को कहा। कुछ ने मोबाइल की सिमों को तुरंत बंद (लॉक) कराने की सलाह दी। किन्तु इन्सानियत पर भरोसा करने वाले कुछ लोगों की राय थी कि सब्र करो, फोन करते रहो, शायद मोबाइल उठाने वाला बंदा बुरी नीयत का न हो। दशहरे के मौक़े पर मोबाइल सिम दफ़्तर पर कर्मचारी अनुपस्थित मिले। शेख़ साहब बड़ी उलझन में थे। पुलिस चौकी जाने से पहले ही मोबाइल ग्राहक सेवा केंद्र के अधिकारियों से सम्पर्क करने की कोशिश कर रहे थे, तभी उनका मन हुआ कि उन सिम नंबरों पर फोन करके देखा जाए। फोन लग गया । दूसरी तरफ से नरेश नाम के किसी व्यक्ति ने एक निश्चित जगह पर मिलने को कहा। दिये गये पते पर शेख़ साहब तुरंत पहुँचे। पिछड़ी बस्ती थी। एक कलारी के पास उस व्यक्ति का घर था। शहर की अन्य कॉलोनियों की तरह रावण दहन जैसी दिखावटी कोई गतिविधि वहाँ नज़र नहीं आ रही थी। चारों तरफ़ बस शांति ही थी। उस व्यक्ति ने अपनी ज़ेब से मोबाइल निकालते हुए शेख़ साहब से कहा- 'भाईसाब, कैसा मोबाइल रखते हो, हमसे तो चला कर भी नहीं बन रहा था! 'कोड' डला है शायद, वरना हम ही फोन कर देते!"

शेख़ साहब ने लपक कर मोबाइल लेते हुए कहा- 'बड़ी मेहरबानी आपकी! आपने फोन उठा लिया, वरना सुना है कि पुलिस वाले सिम बंद तो करवा देते हैं, मोबाइल नहीं खोज पाते! आप बहुत अच्छे इन्सान हो!"

"मज़दूर हूँ साहब, मेहनत की रोटी खाता हूँ! पांच-सात हज़ार के मोबाइल पर कैसे नीयत ख़राब करता?"

यह सुनकर शेख़ साहब ने पर्स से पांच सौ का नोट निकाला और उसे देते हुए कहा- "पांच-सात का नहीं, पूरे अठारह हज़ार रुपये का है यह!"

"नहीं भाईसाब, मुझे कोई ईनाम नहीं चाहिए! आज तो हमने अपना दशहरा मना लिया!" दूर से ही नरेश ने कहा।

यह सुनकर शेख़ साहब ने उसे सीने से लगा लिया। मुहर्रम के अवसर पर आज ऐसा दशहरा मिलन देखकर आसपास खड़े लोगों के चेहरों पर अद्भुत चमक और संतुष्टि थी!

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Arpana Sharma on October 17, 2016 at 10:41pm
बहुत सुंदर भावार्थ लिए लघुकथा का ताना-बनाना बुनाई है। बहुत बधाई आदरणीय शेख उस्मानी जी
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 15, 2016 at 8:16pm
आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी साहब लगता है ताजी घटना है यह। सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2016 at 8:48pm
ख़ुद के ताज़े तज़ुर्बे पर आधारित इस रचना के अनुमोदन व अपने विचार साझा करते हुए हौसला बढ़ाने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब और मोहतरमा राजेश कुमारी साहिबा ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 13, 2016 at 8:14pm

बहुत बढ़िया सार्थक लघु कथा बेहतरीन सन्देश व् प्रेरणा देती हुई दिल से बधाई लीजिये आ० उस्मानी जी |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 12, 2016 at 9:04pm

मोहतरम जनाब शेख शहज़ाद उस्मानी  साहिब ,  हालाते हाज़रा पर यकजहती के रंग में डूबी सीख देती सुन्दर लघु कथा के  लिए दिल से मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं 

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