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चुप्पी में
कई चीखते हुए सवाल हैं
शायद
जिनके उत्तर
किसी भी पोथी
किसी भी दिग्ग्दर्शिका
किसी भी धर्मग्रन्थ
में नहीं हैं
अगर रहे भी हों तो
उन्हें मिटा दिया गया है
हमेसा हमेसा के लिए
ताकि
इन चुप्पियों से
कोई आवाज़ न उठे
चुप कराने वालों के ख़िलाफ़

मुकेश इलाहबदी --------

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 15, 2016 at 5:22pm

बहुत ख़ूब।बधाई आदरणीय

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on February 8, 2016 at 1:19pm

bahut bahut aabhar rachna pasandgee aur pratikriya ke liye  Amitra Tiwari jee

Comment by amita tiwari on February 6, 2016 at 7:41pm


...... बहुत ही गम्भीर व सारगर्भित प्रस्तुति

बधाई

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on February 6, 2016 at 9:46am

rachna pasandgee ke liye bahut bahtu aabhar Sushil Sarma jee aur Saurabh Pandey jee


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2016 at 12:39am

इस अभिव्यक्ति केलिए दिल से बधाई, आदरणीय मुकेश भाई. 

शुभेच्छाएँ 

Comment by Sushil Sarna on February 5, 2016 at 7:03pm

आदरणीय मुकेश जी      सारगर्भित इस रचना की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें । 

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on February 5, 2016 at 9:29am

bahut babhut aabhar rachna pasandgee ke liye mtira Mithilesh Wamankar aur Satvuinder kumar jee


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 4, 2016 at 11:02pm

चुप्पी में
कई चीखते हुए सवाल हैं
शायद
जिनके उत्तर
किसी भी पोथी,
किसी भी दिग्दर्शिका,
किसी भी धर्मग्रन्थ,
में नहीं हैं
अगर रहे भी हों तो
उन्हें मिटा दिया गया है
हमेशा हमेशा के लिए.
ताकि
इन चुप्पियों से
कोई आवाज़ न उठे
चुप कराने वालों के ख़िलाफ़.

आदरणीय मुकेश इलाहबादी जी, बहुत सुन्दर प्रस्तुति. हार्दिक बधाई 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 4, 2016 at 6:11pm
बहुत ख़ूब।बधाई आदरणीय
Comment by Samar kabeer on February 4, 2016 at 6:06pm
जनाब मुकेश जी आदाब,इस प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें !

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