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अतुकांत कविता : प्रतिनिधि (गणेश जी बागी)

मैं सड़क हूँ
मुझे तैयार किया गया है
रोड रोलरों से कुचल कर.


मुझे रोज रौंदते हैं 
लाखों वाहन
अक्सर....
विरोध प्रदर्शन का दंश
झेलती हूँ
अपने कलेजे पर
होता रहता हैं
पुतला दहन भी
मेरे ही सीने पर
विपरीत परिस्थितियों में
मैं ही बन जाती हूँ
आश्रय स्थल
कई कई बार तो
प्राकृतिक बुलावे का निपटान भी
हो जाता है
मेरी ही गोद में


फिर भी.....

मैं सहिष्णु हूँ
या
असहिष्णु !
यह तय करते हैं
कथित बुद्धिजीवी.


मैं सड़क हूँ
एक सच्ची प्रतिनधि
इस देश की.

(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट =>लघुकथा : शातिर

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 3, 2015 at 2:20pm

आदरणीय मिथिलेश भाई, कविता अपने मूल स्वरुप में आप तक पहुँच गयी, आपकी सराहना उत्साहवर्धक है, बहुत बहुत आभार.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 3, 2015 at 12:26pm

सामयिक विषय पर बहुत सुन्दर प्रस्तुति दी है आपने आ० गणेश जी सहिष्णुता का बेहतरीन उदाहरण सड़क से बेहतर क्या होगा दिल से बधाई इस प्रस्तुति पर |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 3, 2015 at 4:40am

आदरणीय बाग़ी सर, बहुत दिनों बाद आपकी रचना प्रस्तुत हुई है. समसामयिक विषय पर शानदार और सटीक रचना हुई है. प्रतीकों में कथ्य की अभिव्यंजना जबरदस्त है. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 2, 2015 at 12:28pm

प्रतिक्रिया हेतु आभार आदरणीय रक्ताले साहब.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 2, 2015 at 12:26pm

आदरणीय अखिलेश भाई साहब, कविता के माध्यम से कविता को सराहने का यह अंदाज पसंद आया, बहुत बहुत आभार.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 2, 2015 at 12:25pm

सराहना हेतु आभार आदरणीय रवि शुक्ला जी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 2, 2015 at 12:24pm

आदरणीया कांता जी, आपकी सराहना इस कविता को प्राप्त हुई, लेखन कर्म सार्थक हुआ, बहुत बहुत आभार.

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 1, 2015 at 10:19pm

मैं सड़क हूँ
एक सच्ची प्रतिनधि
इस देश की............सच कहा है आदरणीय बागी जी बिना शटर की दूकान और किसी के खेल का मैदान और किसी के लिए हेलीपेड भी हो जाती है यह सड़क. सुंदर रचना. बहुत-बहुत बधाई. सादर.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 1, 2015 at 1:46pm

क्या कहना आदरणीय गणेश भाईजी, जब जरूरत हुई उसी समय आपने छक्का मारा, हृदय से बधाई। इस विषय को आगे बढ़ाते हुए एक पुछल्ला प्रेषित कर रहा हूँ ..........

दोनों बाजुओं के

हरे भरे वृक्षों से

मुझे गर्मी में राहत मिलती 

राहगीरों की दुख सुख की बातें सुनती 

वो भी काट दिये

अपने स्वार्थ के लिए

अब न वो ठंडी हवा न छाया

चीख कर रोने की इच्छा होती है

पर मैं चुप रहती हूँ

Comment by Ravi Shukla on December 1, 2015 at 11:26am

आदरणीय गणेश जी समसामयिक रचना हेतु बधाई स्‍वीकार करे ।

कृपया ध्यान दे...

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