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यूँ भी तक़दीर बदलते हैं यहाँ
लोग गिर गिर के संभलते है यहाँ।

दोस्तों ! इक ज़रा मतलब के लिए
लोग चेहरों को बदलते है यहाँ।

माईले हिर्सो हवस है कितने
देख कर ज़र को फिसलते है यहाँ।

आँख की पुतली फिरे फिर शायद
लोग पल भर में बदलते है यहाँ।

ग़ैर की बात नहीं ऐ लोगों
ज़हर अपने भी उगलते है यहाँ।

क्या बिगाड़ेगी हवाये उनका
वो जो तूफान में पलते है यहाँ।

रोशनी बस वही फैलाते है
जो दीये की तरह जलते है यहाँ।

कितने बेदर्द है गुलची देखो
गुल को किस तरह मसलते है यहाँ।

जाँ को "रिज़वान" हथेली पे लिए
हम ही मैदां में निकलते है यहाँ।

* रिज़वान खैराबादी *

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by मिथिलेश वामनकर on November 1, 2015 at 9:57pm

बह्र या वज्न ?

Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on October 31, 2015 at 12:32pm
आशुतोष सर हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।।।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 31, 2015 at 12:12pm

रिजवान जी ..आज आपकी पहली रचना पढने का सौभाग्य मिला ..इस शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on October 30, 2015 at 11:26am
शुक्रिया
Comment by savitamishra on October 30, 2015 at 10:58am

बहुत खूबसूरत

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