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आज़ादी के कई सालों बाद

उसकी तलाश ज़रूरी लगती है .

प्रजातन्त्र की भौतिकवादी

प्रवित्रियो में लिप्त आज़ादी  अधूरी लगती है.

आज़ादी की तलाश  उन बcचो के सपनों में है

जिनका बचपन कलम-किताब छोड़  होटलों में बिकता है

आज़ादी की तलाश  किसानों के खेतों में है

जिनके आखों में पानी  और गले मे मौत है

आज़ादी की तलाश  वेरोज़गार युवीमन में है

जहाँ आखरी डिग्री की आस है

जिससे भूखा पेट भरा जा सके

आज़ादी की तलाश  फूटपाथ पर सोए लोगों के

उनीदे सपनों में है  जहाँ बेरहमी से वो कुचल दिए जाते है

आज़ादी की तलाश उस आखरी आदमी के आखों मे है

.जो मौन है संवेदनाएँ मर गयी हैं

रोटी ही जिसका आखरी लक्ष्य है

खुद नही जानता वो कौन है.....

अप्रकाशित/ मौलिक

डॉ दिलीप तिवारी

Views: 478

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Comment by दिलीप कुमार तिवारी on August 19, 2015 at 12:00am

dhanyabad sabhi ko


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Comment by मिथिलेश वामनकर on August 16, 2015 at 11:09pm

बढ़िया प्रस्तुति हुई है हार्दिक बधाई आदरणीय दिलीप जी 

Comment by pratibha pande on August 16, 2015 at 11:15am

दिमाग़ को झंकझोरती रचना , बधाई इस प्रस्तुति के लिए आपको आ० दिलीप जी

Comment by सूबे सिंह सुजान on August 16, 2015 at 3:59am
बहुत अच्छा ।
यह तलाश बहुत जरूरी है लेकिन हम अपना व्यवहार कहाँ बदलते हैं?

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