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तुमको पत्थर में नहीं मूरत दिखाई दे रही

२१२२       २१२२         २१२२       २१२२

तुमको पत्थर में नहीं मूरत दिखाई दे रही है 

नदियों की कल कल न बांधों में सुनायी दे रही है 

कोई भी इल्जाम मैंने तो लगाया था नहीं फिर 

वो हंसी गुल जाने क्यूँ इतनी सफाई दे रही है 

चीख बस बच्चों कि ही तुमको सुनायी देती है क्यूँ 

ये न देखा लाडले को माँ दवाई दे रही है 

एक रोटी के लिए तरसा दिया उस माँ को तुमने

जो गृहस्ती ज़िंदगी भर की बनायी दे रही है 

काम दुनिया में अकेली माँ ही ये कर सकती है बस 

रोटी भूखे बच्चे को खुद को बचाई दे रही है 

आबरू उस माँ की लूटें आज उसके लाडले ही 

जिसकी वो ममता जमाने से दुहाई दे रही है 

उम्र भर का साथ हमने दोस्तों जिससे था माँगा 

वो हंसी गुल ज़िंदगी भर की जुदाई दे रही है 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 6, 2015 at 11:34am

काम दुनिया में अकेली माँ ही ये कर सकती है बस 

रोटी भूखे बच्चे को खुद को बचाई दे रही है..

खूबसूरत भाव और एक सत्य लिए  अच्छी गजल के लिए दाद कुबूल करें
भ्रमर ५


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 5, 2015 at 11:33pm

आदरणीय आशुतोष जी शानदार ग़ज़ल हुई है दिल से दाद हाज़िर है 

एक मिसरे पर छोटा सा सुझाव, यदि उचित लगे तो-

उम्र भर का साथ हमने दोस्तों जिससे था माँगा 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 5, 2015 at 11:26pm

आदरणीय गिरिराज भाईसाब ..मेरी हर रचना को आपका स्नेह और मार्गदर्शन मिलता है ये मेरे लिए बेशकीमती है ..रचना पर आपकी उत्साहित करने वाली प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 5, 2015 at 11:24pm

आदरणीय कृष्णा जी ..रचना आपको पसंद आयी यह मेरे लिए बेहद खुसी की बात है सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 5, 2015 at 11:23pm

आदरणीय वीनस जी ...रचना पर आपकी प्रतिक्रिया से मेरे उत्साह काफी बढ़ा है ..मैं जो कुछ भी लिख पा रहा हूँ उसमे आप सबका मार्गदर्शन और स्नेह शामिल है ..मार्गदर्शन बस यूं ही मिलता रहे इसी कामना के साथ सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 5, 2015 at 4:41pm

आदरणीय आशुतोष भाई , बहुत अच्छी गज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ॥

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 5, 2015 at 10:59am

काम दुनिया में अकेली माँ ही ये कर सकती है बस 

रोटी भूखे बच्चे को खुद को बचाई दे रही है                 वाह वाह!

बहुत ही सुन्दर गज़ल हुयी है आ० आशुतोष सर,दिली दाद और मुबारकबाद कबूल करें!

Comment by वीनस केसरी on May 5, 2015 at 3:55am

वाह बहुत खूब ...

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 4, 2015 at 4:17pm

आदरणीय समर कबीर जी आप का मार्गदर्शन और स्नेह यूं ही मिलता रहेगा तो लेखन को नयी उर्जा मिलती रहेगी सादर 

Comment by Samar kabeer on May 4, 2015 at 3:18pm
जनाब डा.आशुतोष मिश्रा जी,आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |
मैं जनाब निलेश 'नूर' जी की बात से सहमत हूँ |

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