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आवारा ( लघु-कथा )

पापा आवारा किसे कहते हैं  ? चार साल के बिट्टू के इस प्रश्न पर मैं थोडा चौंका , फिर गोद में लेकर प्यार से उसके सर पर हाथ फेर कर बोला, बेटा आवारा उसे कहते हैं जिसका कोई नहीं होता, जो व्यर्थ गली-गली घूमता है ! ...तो ..पापा  क्या दादा जी का कोई नहीं है... ? जो मम्मी रोज कहती है ....इस उम्र में भी भटकता रहता है आवारा जैसा ....शाम को भोजन के वक्त घर याद आता है ..............  

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

राजू आहूजा 

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Comment by rajkumarahuja on April 17, 2015 at 4:58pm

आप शायद ठीक कह रही हैं माननीया सविता मिश्रा जी !

Comment by savitamishra on April 16, 2015 at 11:06pm

अच्छी लघुकथा..आजकल ऐसे आवारा लोगो की तादाद बढ़ रहीं हैं

Comment by rajkumarahuja on April 16, 2015 at 10:27pm

माननीय गिरिराज भंडारी जी , इंसान की उम्र में एक पड़ाव ऐसा भी आता है, जब उसके अपनों के पास भी उसके लिए समय नहीं रहता ! जब उसे शेष जीवन जीने के लिए प्यार और सहानुभूति के स्थान पर तिरिस्कार और अपमान मिलता है , तो उस एकाकीपन को  इस दौर में " आवारा " जैसा संबोधन मिलना कोई अतिश्योक्ति नहीं ....सादर !   

Comment by rajkumarahuja on April 16, 2015 at 10:03pm

माननीय सर्वश्री , जवाहरलालसिंह जी,  गिरिराज भंडारी जी,  डा. विजय शंकर जी,  नीरज कुमार "नीर" जी,  सुभाष पांडे जी  एवं जीतेन्द्र पस्टारिया जी, प्रयास की सराहना हेतु ...आभार ! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाएं आगे भी मिलती रहेंगी ऎसी आशा के साथ .........  

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 16, 2015 at 7:58pm

बहुत बढ़िया लघुकथा, आदरणीय राजकुमार जी. बधाई स्वीकारें..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2015 at 6:20pm

अच्छी लघुकथा हुई है, आदरणीय राजकुमारजी.

वैसे ऐसे वाकयों पर लघुकथायें आती रही हैं. लेकिन आपकी शैली अवश्य अच्छी लगी है. 

शुभेच्छाएँ

Comment by Neeraj Neer on April 16, 2015 at 5:41pm

बहुत मार्मिक ॥ 

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 16, 2015 at 4:52pm
इस उम्र में भी भटकता रहता है आवारा जैसा ....शाम को भोजन के वक्त घर याद आता है ..............
लघु- कथा तो यहां है , इस पंक्ति में , सुन्दर , बधाई , आदरणीय राजकुमार जी , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 16, 2015 at 3:52pm

आदरणीय , आवारापन , आदत भी हो सकती है और मज़बूरी भी , घर जब बैठने उठने के लायक न रह जाये तो आवारा भटकना भी पड़ सकता है , मै कथा को इस अर्थ मे ले  रहा हूँ । कथा के लिये आपको हार्दिक बधाई ।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 16, 2015 at 12:44pm

बच्चे मन के सच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं .... बहुत बढ़िया बेहतरीन प्रस्तुति!

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