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***ऐ सांझ ,तू क्यूँ सिसकती है .......***

ऐ सांझ ,तू क्यूँ सिसकती है .......

ऐ सांझ ..
तू क्यूँ सिसकती है //
अभी कुछ देर में ..
तिमिर घिर जाएगा …
तिमिर की चादर में …
हर रुदन छुप जाएगा //
रुदन …
उस क्षण का …
जब एक ….
किलकारी ने ….
अपनी चीख से ब्रह्मांड में ….
सन्नाटा कर दिया //
रुदन उस क्षण का ….
जब एक कोपल …
एक वहशी की वासना का ….
शिकार हो गयी //
रुदन उस क्षण का …..
जब दानव बना मानव ……
दरिंदगी की सारी हदें …..
पार कर गया //
रुदन उस क्षण का …..
जब एक पुष्प से …..
कोई छद्मवेशी मानव …..
कुकृत्य कर …..
मानवता को …..
रक्त रंजित कर गया //
हाँ,
ऐ साँझ
ये तो रुदन तो …..
वक्त की सुईयों के साथ ….
शायद ….
धीरे धीरे …..
शून्यता में लीन हो जाएगा //
लेकिन क्या कोई …
एक मोमबत्ती जलाकर ….
इस रुदन के विरुद्ध आवाज उठाएगा ?
क्या कोई …
इस दरिन्दे के नुकीले नाखूनों से ….
माँ ,बहन,बीवी,और बेटी के …..
पावन रिश्ते को ….
लहू लुहान होने से बचाएगा ??
हाँ !
एक एक मोमबत्ती हम सब को …
इस दरिंदगी को ….
जड़ से मिटाने के लिए ….
जलानी होगी //
हर चुनरी की ,,,,
लाज बचानी होगी //
तभी ,
हाँ तभी ,
ऐ सांझ तू सुहानी होगी //
ऐ सांझ तू सुहानी होगी ……..


सुशील सरना

मौलिक और अप्रकाशित

Views: 413

Comment

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Comment by Sushil Sarna on December 7, 2013 at 8:14pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी, नमस्कार - रचना पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया एवं प्रशंसा का मैं तहे दिल शुक्रिया अदा करता हूँ - रचना में आपके द्वारा अपेक्षित बातों का मैं भविष्य में अपनी रचनाओं में निर्वाह करने का प्रयत्न करूंगा - आपके सुझाव मेरे लिए अनमोल हैं -आदरणीय ये एक घटना से उपजा भाव था जिसे मैंने शब्दों में बाँध प्रस्तुत करने का प्रयास किया था - ये इस रचना का सौभाग्य है कि आपने न केवल उसे सराहा,बल्कि उस पर अपने अनमोल विचार दिये -आपका हार्दिक आभार सर - कृपया स्नेह बनाये रखें -धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 7, 2013 at 7:15pm

इस रचना को और इस पर आयी टिप्पणियों को भी देख गया. पहली बधाई तो इसी बात की कि आपकी प्रस्तुत रचना एक गहन और आज के अत्यंत प्रासंगिक तथ्य को विन्दुवत उठाने का प्रयास कर रही है. लेकिन इस के साथ ही आपकी रचना से एक और दायित्व के निर्वहन की अपेक्षा है. वह है, संप्रेषण के साथ-साथ कविता की अंतर्दशा और शिल्प का. यह वस्तुतः सही है कि रचना अपने प्रारम्भ के बाद भाषण हो गयी है. यह अलग बात है कि कई सामयिक विन्दु सपाटबयानी की मांग करते हैं और सीधी-बात के लहज़े में उनका कहा जाना अधिक उचित प्रतीत होता है.

परन्तु, ऐसा हमेशा नहीं होता. यदि होता है भी तो प्रसंग एकदम से तारी हुए माहौल में संघनीभूत होता है. 

बहरहाल आपके प्रयास को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ. आपके अन्य कहे का इंतज़ार रहेगा.

सादर

Comment by Sushil Sarna on December 2, 2013 at 5:24pm

aa.Vijay Mishr jee rachna ke marm par aapkee smekshaatmak pratikriya ne rachna aik naee oonchaaee prdaan kee hai....aapka tahe dil se shukriya.....diya aur kandeel is anyaay ke virudh aik smarthan aur toofaan ka sanket hai....hr diya aur kandeel aik chingaaree hai jo is anetikta ko jlaane ke liye betaab hai....aik aik chingaaree daavanal ka roop bn is ghinone krity ko jla kr raakh kr degee....aapke vichaaron ka smarthan pa rachna dhny huee....aapka punah aabhaar 

Comment by विजय मिश्र on December 2, 2013 at 1:07pm
ये रुदन अब किसी सौम्या की सिसकन भर नहीं रह गयी है ,इसने घर की लाडो को लाचार और दीन-हीन बना दिया है ,घर-घर की नींद हराम कर रहा है , दानवों ने जिस तरह से कहर बरपाया है ,समूचा समाज आक्रान्त है और घोर क्रन्दन कर रहा है . दीया और कन्दील जलाने के दौर से हम बाहर हो गए हैं ,दावानल उठाने की आवश्यकता प्रतीत होती है फिर भी आपका नजीर सर-आँखों पर | रचना अत्यंत मार्मिक है और मर्मस्थल को बेधती भी है . सादर आभार सुशीलजी .
Comment by Sushil Sarna on December 1, 2013 at 4:43pm

Arun Sharma Anant jee rachna par aapkee madhur abhivyakti ka haardik aabhaar

Comment by अरुन शर्मा 'अनन्त' on December 1, 2013 at 2:55pm

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीय बधाई स्वीकारें

Comment by Sushil Sarna on November 30, 2013 at 3:04pm

aa.Rajesh jee aapke sujhaav ka shukriya, main is pr gour karoonga. dhnyvaad

Comment by राजेश 'मृदु' on November 30, 2013 at 2:15pm

आदरणीय, बृजेश जी का मंतव्‍य गौर करने लायक है, सादर

Comment by Sushil Sarna on November 30, 2013 at 1:19pm

Shyam Narain Verma jee rachna par aapke sneh ka haardik aabhaar

Comment by Sushil Sarna on November 30, 2013 at 1:18pm

aa.Brijesh Neeraj jee rachna par aapke sneh aur amuly sujhaav ka tahe dil se shukriya. aadrneey maine jis bhav ko lakshy rakhkr rachna ka srijan kiya tha, usko ant tak laane ke prayatn kiya hai. mujhe apne bhaav men kaheen tootan nazar naheen aatee ho sakta hai maine jis bhaav aur prvaah men rachna ko likha hai usee men usko pdha hai shaayad isliye mujhe atkaav nazar naheen aataa. aapka kathan aur sujhaav mere liye anmol hai....aap jaison se seekhkar hee kuch likh paane ka saahas kr paata hoon...aadrneey kripya mere kathan ko anytha n laivain...mujhe naheen lagta ki rachna chrmraa ke giri hai...fir bhee aapne rachna men ruchi dikhaaee, apna sujhaav diya. haardik aabhaar...kripya sneh bnaaye rakhain

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