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फासलों का यह किनारा और है। ……… गजल

आज से रस्ता हमारा और है
साथ चलने का इशारा और है
.
चल रही ऐसी यहाँ पर आंधियाँ
घर का बिखरा ये नजारा और है
.
या खुदा रहमत नहीं अब चाहिए
फासलों का ये किनारा और है
.
ख्वाहिशों को तोडा था तुमने कभी
फिर भी दिल ने हाँ पुकारा और है
.
हर ख़ुशी मिलती नहीं टकराव से
हार जाने का इजारा और है
.
भूल जायेंगे चलो दुख की निशा
प्यार के सुख का सहारा और है
.
जीत लेंगे मुश्किलों की रहगुजर
होसलों का अब नजारा और है

----- शशि पुरवार

मौलिक और अप्रकाशित

Views: 677

Comment

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Comment by shashi purwar on September 30, 2013 at 11:42am

saurabh ji tahe dil se abhaat -


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 27, 2013 at 11:43pm

ग़ज़ल पर बधाई स्वीकारें आदरणीया..

शुभ-शुभ

Comment by shashi purwar on September 26, 2013 at 11:01am

नमस्ते वीनस जी

बहुत बहुत धन्यवाद आपका ,हाँ आपका कथन सत्य है ,मैंने इन शब्दों को बदल दिया है ,परन्तु यहाँ बदलाव नहीं कर सकी ,यह गजल इस प्रकार है

आज से रस्ता हमारा और है
साथ चलने का इशारा और है

चल रही ऐसी यहाँ पर आंधियाँ
घर का बिखरा ये नजारा और है

या खुदा रहमत नहीं अब चाहिए
फासलों का ये किनारा और है

ख्वाहिशों को तुमने तोड़ा था कभी
फिर भी दिल ने हाँ पुकारा और है

हर ख़ुशी मिलती नहीं टकराव से
हार जाने का इजारा और है

भूल जायेंगे चलो दुख की निशा
प्यार के सुख का सहारा और है

जीत लेंगे मुश्किलों  की रहगुजर
होसलों का अब नजारा और है

----- शशि पुरवार
22 / 9 /13

Comment by वीनस केसरी on September 26, 2013 at 2:28am

ख्वाहिशों को तोडा था तुमने कभी
फिर भी दिल ने हाँ पुकारा और है

.

.
भूल जायेंगे चलो दुख की निशा
प्यार के सुख का सहारा और है

वाह वा
आदरणीया अच्छी ग़ज़ल हुई है
बधाई स्वीकारें

कुछ शब्दों पर आपको फिर से ध्यान देना होगा

हवा की आंधियां कहना ऐसा ही है जो हम कहें - गीला पानी, काला कोयला ... इससे बचना चाहिए

आपदाओं को बहर निभाने के लिए आपदों नहीं किया जा सकता

सादर

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on September 25, 2013 at 2:13pm

सुन्दर गजल के लिए बधाई आदरणीया

Comment by Parveen Malik on September 24, 2013 at 11:55am
बहुत सारी गजलें पढ़ने को मिल रहीं है अब लग रहा है कि हमें भी गजल लिखना सीखना चाहिए ....
आदरणीय शशि जी हर एक शेर लाजवाब है बधाई स्वीकारें !
जीत लेंगे आपदो की रहगुजर
होसलों का अब नजारा और है !! बहुत खूब !!!
Comment by अरुन 'अनन्त' on September 24, 2013 at 11:38am

आदरणीय शशि पुरवार जी बेहद सुन्दर खूबसूरत ग़ज़ल सभी अशआर पसंद आये इस हेतु दिली दाद कुबूल फरमाएं.

खुशियाँ मिलती नहीं टकराव से ??? यहाँ एक शब्द छूट गया है कृपया देख लें.

Comment by shashi purwar on September 24, 2013 at 10:58am

shijju ji धन्यवाद ,गजल की बहर  -- २१२२ २१२२ २१२  है

Comment by shashi purwar on September 24, 2013 at 10:56am

अनुराग जी , अनुपमा जी ,वंदना जी ,जीतेन्द्र जी , गिरिराज जी , राज लाली जी ,राजेश्कुमारी जी ,मीना जी , विजय जी सभी मित्रो ता तहे दिल से आभार आप सभी की उर्ज्व्सित करती हुई अनमोल  टिप्णी मेरे लिए अनमोल तोहफा है , स्नेह बनाये रखें।

Comment by vandana on September 24, 2013 at 7:14am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल बहुत सुन्दर भाव 

कृपया ध्यान दे...

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