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नक्श ढूँढे वो मेरा हस्ती मिटाने के बाद

वज्न: 2122 1122 1122 22/112 

कोई याद अब करे है मुझको भुलाने के बाद

नक्श ढूँढे वो मेरा हस्ती मिटाने के बाद

हो गया गर्क़ सफीना मेरा इक तूफां में

चुप है अब मौजे-तलातुम यूँ डुबाने के बाद

लगती है बोली परस्तिश को अकीदत की यहाँ

अब यकीं लुटता है बाज़ार में आने के बाद

रोये क्यूं अपनी तबाही पे अब ऐ नादां तू

खुद मुदावे को गया जान से जाने के बाद

ऐ बशर अब न पशेमां हो नई सांस ले यूँ

इक नई शमअ-ए-उम्मीद जलाने के बाद

-मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 8, 2013 at 9:00am

क्या बात है सिज्जू जी, बड़ी खुबसूरत ग़ज़ल कही है, अशआर अच्छे लगें, दाद कुबूल करें । 

Comment by vandana on September 8, 2013 at 6:25am

ऐ बशर अब न पशेमां हो नई सांस ले यूँ

इक नई शमअ-ए-उम्मीद जलाने के बाद

बहुत बढ़िया सर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 8, 2013 at 12:19am

कोई याद अब करे है मुझको भुलाने के बाद

नक्श ढूँढे वो मेरा हस्ती मिटाने के बाद.............वाह! शानदार मतले से शुरुआत

रोये क्यूं अपनी तबाही पे अब ऐ नादां तू

खुद मुदावे को गया जान से जाने के बाद...........यह शेर बहुत पसंदीदा हुआ

बेहद उम्दा गजल, दिली दाद कुबूल कीजिये आदरणीय शिज्जू जी

Comment by Meena Pathak on September 7, 2013 at 10:40pm

ऐ बशर अब न पशेमां हो नई सांस ले यूँ

इक नई शमअ-ए-उम्मीद जलाने के बाद.........बहुत सुन्दर ग़ज़ल
बधाई आप को

Comment by मोहन बेगोवाल on September 7, 2013 at 10:34pm

  आदरनीय शिज्जू जी, आप की गजल बहुत उम्दा हे ,ये शेर बहुत अच्छा लगा 

लगती है बोली परस्तिश को अकीदत की यहाँ

अब यकीं लुटता है बाज़ार में आने के बाद

Comment by mrs manjari pandey on September 7, 2013 at 10:00pm

       आदरणीय शिज्जु जी अच्छी गज़ल के लिये बहुत बहुत बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 7, 2013 at 8:38pm

आदरनीय शिज्जू भाई , लाजवाब गज़ल कही भाई , बधाई !!

Comment by ram shiromani pathak on September 7, 2013 at 3:50pm

ऐ बशर अब न पशेमां हो नई सांस ले यूँ

इक नई शमअ-ए-उम्मीद जलाने के बाद////बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है अपने भाई सिज्जू जी //हार्दिक बधाई 

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