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अभी तो मुझे
दौड कर पार करनी है दूरियां
अभी तो मुझे
कूद कर फलांगना है पहाड़
अभी तो मुझे
लपक कर तोडना है आम
अभी तो मुझे
जाग-जाग कर लिखना है महाकाव्य
अभी तो मुझे
दुखती लाल हुई आँख से
पढनी है सैकड़ों किताबें
अभी तो मुझे
सूखे पत्तों की तरह लरज़ते दिल से
करना है खूब-खूब प्या....र
तुम निश्चिन्त रहो मेरे दोस्त
मैं कभी संन्यास नही लूँगा...
और यूं ही जिंदगी के मोर्चे में
लड़ता रहूँगा नई पीढ़ी के साथ
कंधे से कंधा मिलाकर....

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 6, 2013 at 2:22pm

यही जज्वा होना भी चाहिए ..इस जिन्दादिली को सलाम ..ऐसी रचनाओं की आज बहुत दरकार है ..सादर बधाई के साथ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 6, 2013 at 7:07am

क्या बात है ?

जीवन के उत्फुल्ल क्षणॊं के प्रति हामी होने का बेबाक चित्रण हुआ है.  मानों, अपने अंदर रूप अख़्तियार करते तथागत द्वारा अपनी दैहिक संग्नता से अपनी प्रिय में प्रतिपल विह्वल होती सशंक जीती यशोधरा को आश्वस्त करने का सायास प्रयास हो. 

सम्बन्धों के अत्यंत क्लिष्ट मनोवैज्ञानिक पहलू को साझा करते इस पद्य-भाग के लिए आपको बार-बार बधाइयाँ, आदरणीय अनवर सुहैलभाईजी.. .

सादर

Comment by Shyam Narain Verma on June 5, 2013 at 4:49pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by विजय मिश्र on June 5, 2013 at 2:14pm
अनवर भाई , इसे ही इंसानी फितरत कहेंगे ,इंसान फ़कत इंसान बना रहे तो ये दौर इतना जालीम है कि उसे करिश्माई कहते हैं .ऐसा कमिटमेंट तो हर एक के पास होना चाहिए .प्रेरणाप्रद .
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 5, 2013 at 9:53am

तुम निश्चिन्त रहो मेरे दोस्त
मैं कभी संन्यास नही लूँगा...
और यूं ही जिंदगी के मोर्चे में
लड़ता रहूँगा नई पीढ़ी के साथ
कंधे से कंधा मिलाकर....बहुत खूब श्री अनवर सुहैल भाई क्या सुन्दर पैगाम दिया है इन पंक्तियों में हार्दिक बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on June 4, 2013 at 9:22pm

bahut  sundar adarneey///hardik badhai

Comment by Abid ali mansoori on June 4, 2013 at 8:54pm
वाह!

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