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अद्भुत कला है

बिना कुछ किये

दूजे के कामों को

खुद से किया बताकर

बटोरना वाहवाही...

जो लोग

महरूम हैं इस कला से

वो सिर्फ खटते रहते हैं

किसी बैल की तरह

किसी गधे की तरह

ऐसा मैं नही कहता

ये तो उनका कथन है

जो सिर्फ बजाकर गाल

दूसरों के कियेकामों को

अपना बताकर 

गिनाते अपनी उपलब्धियां...

क्या करूँ 

मुझमें ऐसी कोई खासियत नही

ऐसे कोई गुण नही

इसीलिये हमेशा की तरह

खटते रहता हूँ

पदते रहता हूँ मैं ...

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Comment

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Comment by विजय मिश्र on June 3, 2013 at 4:51pm

यह कलियुग है - पण्डित सोई जो गाल बजाबा , इस दौर में करने वालों की अहमियत नहीं हैं , लंगूरों का जमाना है .

आज के सच की जमीन को बहुत जाएज मुकाम दिया है आपने . बहुत सही .

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 3, 2013 at 12:24am

यथार्थ भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति.सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय अनवर सौहेल साहब 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 11:28pm

उफ़्फ़ !

रचना से उमगते सच ने हिला कर रख दिया आदरणीय अनवर सुहैल भाईजी.

इसके आगे कुछ न कहूँगा. आपकी रचनाधर्मिता आपके रचनाकर्म को इसीतरह से सचेत तथा सचेष्ट रखे.

सादर

Comment by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on May 31, 2013 at 5:19pm

bahut sunda rachna ... aisaa hota hai samaaj me... koi karta hai koi kahta hai...

Comment by Abhinav Arun on May 27, 2013 at 9:25pm

श्री अनवर जी यथार्थ परक रचना के लिए हार्दिक बधाई ! 

कृपया ध्यान दे...

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