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कुछ हो मत हो नेता दिख -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२/२२/२२/२
*
कुछ हो मत  हो  नेता दिख
मुख से निकला वादा दिख।१।
*
दुनिया को  गर  खुश रखना
उसके हित बस खटता दिख।२।
*
शीष  नवायें  सब  तुझ  को
इच्छा  है   तो   दादा  दिख।३।
*
लोकतन्त्र  की   रीत  निभा
राजा  होकर  जनता  दिख।४।
*
खबरों   में   गर   आना   है
नियमित से बस उल्टा दिख।५।
*
भीड़  जुटानी  अगल बगल
जीने  से  बढ़  मरता  दिख।६।
*
आज  समय  विज्ञापन का
मत दे कुछ भी दाता दिख।७।
*
अगर  तरक्की  नाम  रखा
बस कागज  में  होता दिख।८।
**
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 6, 2023 at 9:40pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 22, 2023 at 2:42pm
वाह आदरणीय जी बहुत सुंदर और सार्थक प्रस्तुति सर हार्दिक बधाई
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 14, 2023 at 9:50pm

आ. भाई विजय शंकर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 13, 2023 at 8:25am

बहुत ही सटीक प्रस्तुति,
लोकतन्त्र की रीत निभा
राजा होकर जनता दिख।४।
* , आदरणीय लक्ष्मण धामी जी , बहुत बहुत बधाई ,सादर.

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