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शिवजी जैसा किसने माथे साधा होगा चाँद -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२ २२२२ २२२२ २
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पर्वत पीछे गाँव पहाड़ी निकला होगा चाँद
हमें न पा यूँ कितने दुख से गुजरा होगा चाँद।१।
*
आस नयी जब लिए अटारी झाँका होगा चाँद
मन कहता है झुँझलाहट से बिफरा होगा चाँद।२।
*
हम होते तो कोशिश करते बात हमारी और
शिवजी जैसा किसने माथे साधा होगा चाँद।३।
*
चाँद बिना हम यहाँ  नगर  में जैसे काली रात
अबके पूनौ हम बिन भी तो आधा होगा चाँद।४।
*
बातें करती होगी बैठी याद हमारी पास
कैसे कह दें तन्हाई  में तन्हा होगा चाँद।५।
*
ज्ञात पलायन भले हमारा लेकिन बाँधे आस
झील किनारे साँझ  सकारे सँवरा होगा चाँद।६।
*
हालातों ने विवश किया जो आये उसको छोड़
भूल गये हम शायद  ये  ही  समझा होगा चाँद।७।
*
कोई राह निकालो भगवन इतनी है अरदास
नदी उफनती बता रही नित रोता होगा चाँद।८।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

(१-१०-२३)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 8, 2023 at 3:19pm

आ. भाई सुरेंद्र जी, सादर अभिवादन। गजल पर आपकी मनोहारी टिप्पणी से बहुत उत्साहवर्धन हुआ। इसके लिए हार्दिक आभार।

Comment by डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा on October 8, 2023 at 12:25pm

प्रिय आत्मन,

बहुत स्नेह से बाँध भुलाया उसको: "हालातों ने विवश किया जो आये उसको छोड़, भूल गये हम शायद  ये  ही  समझा होगा चाँद" 

बहुत प्रभावी भावाभिव्यक्ति. बहुत प्रशंसनीय.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 1, 2023 at 3:19pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 1, 2023 at 2:11pm
वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत ही खूबसूरत सृजन हुआ है सर । हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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