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खोजने  जाऊँ कहाँ  जान से प्यारे  आँसू
ढल गये  आँख  से  चुपचाप हमारे  आँसू

इस तरह  देख सकूँगा न बिखरते  इनको
कितना टूटे हैं तो आँखों  में  सँवारे  आँसू

शब अँधेरी  है हवा  सर्द  तसव्वुर  उनका
याद  मीठी  है  बड़ी  और  हैं खारे  आँसू

मुझको भाती नहीं ये बोलती पुरनम आँखें
काश  आँखों से  चुरा लूँ  मैं  तुम्हारे  आँसू

ये भला कौन सा इंसाफ  हुआ उल्फ़त  में
की ख़ता  दिल ने  बहे  दर्द  के मारे  आँसू
बिन  तुम्हारे  न  कहीं   जान  हमारी  जाये
वक़्त-ए-फुरक़त में बने दिल के सहारे आँसू

काश इनसे ही बुझे प्यास हरिक मंज़र की
हमने  पलकों  से  यही  सोच  उतारे आँसू
बस इसी  बात पे हैरान  हुआ जाता  'ब्रज'
ग़म  किसी और का  बहते हैं  हमारे आँसू
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 27, 2021 at 9:58pm

स्वागत संग आभार आदरणीय धामी जी...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 26, 2021 at 9:39am

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 8, 2021 at 9:10pm

आदरणीय मेथानी जी आपके सुंदर और मनोहारी शब्दों के लिए आपका हार्दिक अभिनंदन और आभार...स्नेह बनाये रखें।

Comment by Dayaram Methani on November 8, 2021 at 1:47pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी, बहुत सुंदर ग़ज़ल प्रस्तुत की है आपने। कुछ पंक्तियां तो बहुत सुंदर है। मसलन ..... याद मीठी है बड़ी और हैं खारे आँसू और की ख़ता दिल ने बहे दर्द के मारे आँसू। इसी प्रकार अन्य पंक्तियां भी बहुत अच्छी लगी। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 8, 2021 at 11:33am

आदरणीय अमीरुद्दीन जी ग़ज़ल पे आपकी शिरकत और हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया..

सातवें शे'र का भाव नहीं समझ सका हूँ। शेष शुभ-शुभ

सब कल्पनाओं का खेल है आदरणीय...विरह में तपता हुआ एक व्यक्ति को हर चीज व्याकुल जैसी भी प्रतीत होती है।कई बार वो अपने आसुओं में सब कुछ डुबो देने की बात करता है...कई बार विरहानल मे जला देने की...ऐसे ही हर तड़पती शय की प्यास बुझे..आगे आपकी राय महत्पूर्ण है...सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 8, 2021 at 11:25am

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है ..
याद मीठी है बड़ी और हैं खारे आँसू.. इस मिसरे के लिए विशेष दाद लीजिये
बधाई

आदरणीय नीलेश जी आपके शब्द पारितोषिक हैं मेरे लिए..इस काफ़िये और रदीफ़ पे बड़ी ही प्यारी ग़ज़लें पढ़ी हैं बस उन्हीं का अनुसरण करने की कोशिश है।सादर

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on November 7, 2021 at 10:59pm

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें। 

'ढल गये आँख से चुपचाप हमारे आँसू'  (आँखों कर लें) 

सातवें शे'र का भाव नहीं समझ सका हूँ। शेष शुभ-शुभ। 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 7, 2021 at 7:21pm

आ. बृजेश ब्रज जी,

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है ..
याद  मीठी  है  बड़ी  और  हैं खारे  आँसू.. इस मिसरे के लिए विशेष दाद लीजिये 
बधाई 

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