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उम्मीद .......

मैं जानती हूँ
बन्द साँकल में
कोई आवाज नहीं होती
मगर होती हैं उसमें
उम्मीद की सीढ़ियों पर सोयी
अनगिनत प्यासी उम्मीदें
किसी के लौट आने की

मैं ये भी जानती हूँ
कि उम्मीद के दामन में
दर्द के सैलाब होते हैं
कुछ हसीन ख़्वाब होते हैं
साँझ के साथ
उम्मीद भी जवान होती है
शब
इन्तज़ार के पैरहन में रोती है
जानती हूँ
उम्मीद झूठी होती है
मगर दिल की बसती में
उम्मीद तो उम्मीद होती है

नज़र की ख़ामोशी
ख़ामोश साँकल से बात करती है
किसी दस्तक की फरियाद करती है
तन्हाई से गुफ़्तगू होती है
झूठ ही सही
मगर
उम्मीद तो उम्मीद होती है

सुशील सरना / 15-9-21
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on September 23, 2021 at 8:50pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Samar kabeer on September 22, 2021 at 11:21am

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on September 17, 2021 at 9:37pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 17, 2021 at 8:25am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर रचना हुई है। हार्दिक बधाई। 

Comment by Sushil Sarna on September 15, 2021 at 9:43pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन के भावों को आत्मीय मान से सम्मानित करने का दिल से आभार । आप की बात में दम है सर लेकिन मेरे सृजन का पात्र इसको झूठ मानने के बावजूद उम्मीद रखता है । सादर नमन सर हार्दिक आभार
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 15, 2021 at 6:48pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी पर्वाज़ ली है, कविता भावपूर्ण हुई है।

मगर अन्त 'झूठ ही सही' से क्यों? 'आभासी ही सही' या 'ख़याली ही सही' से होना चाहिए। सादर। 

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