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उस रात .......

उस रात
वो बल्ब की पीली रोशनी
देर तक काँपती रही
जब तुम मेरी आँखों के दामन में
मेरे ख्वाबों को रेज़ा-रेज़ा करके
चले गए
और मैं बतियाती रही
तन्हा पीली रोशनी से
देर तक

उस रात
मुझसे मिलने फिर मेरी तन्हाई आई थी
मेरी आरज़ू की हर सलवट पर
तेरी बेवफाई मुस्कुराई थी
और मैं
अन्धेरी परतों में
बीते लम्हों को बीनती रही
देर तक

उस रात
तुम उल्फ़त के दीवान का
पहला अहसास बन कर आए
मेरी हर नफस में समाये
दूरियाँ सिमटती गईं
हया
बेहया हुई
जाने कब टूट गया
वो तिलस्म बांहों का
और मैं
मिटाती रही बदन से
तुम्हारी बेहयायी के निशान
देर तक


सुशील सरना /13-9-21
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 559

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Comment by Sushil Sarna on October 3, 2021 at 4:34pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी ।
Comment by Sushil Sarna on October 3, 2021 at 4:33pm
आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार । आप की बात से सहमत हूं । सादर नमन सर
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 23, 2021 at 6:25pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, भावनाओं के समुद्र में गोते लगाती आपके अपने अंदाज़ की सुंदर रचना हुई है, हार्दिक बधाई स्वीकार करें। सादर। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 23, 2021 at 1:06pm

आदरणीय सुशील सरना जी, प्रस्तुति में भावमय शृंगारिक संयोगों के मधुरिम क्षणों का रोचक शाब्दिक विन्यास हुआ है. 

रचना की संप्रेषणीयता सहज है. हार्दिक बधाई स्वीकार करें. 

वैसे, बिम्बों और कथ्य में अभिनव प्रयास आवश्यक है. अतः, ऐसे में तदनुरूप नवीनता रचनाओं को विशेष आयाम दे सकती है. 

शुभ-शुभ

Comment by Sushil Sarna on September 18, 2021 at 4:11pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 17, 2021 at 10:07pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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