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गांव मुहल्लों के लोग कोरोना के कहर के भय से मुक्त अब राहती राशन की आस में खुश हैं।मुखिया, सरपंच और गांव के अगहरिया लोगों के सभी लोग राशन कार्ड धारी हैं ही,लाल कार्ड वाले भी हो गए हैं।भले ही साधन संपन्न हों,तो क्या हुआ?एक बार कुछ ले देकर नाम शामिल हो गए,तो फिर चांदी ही चांदी है।मुफ्त का माल खाते रहिए।पूछता ही कौन है? वातावरण इसी मुआफिक बना हुआ है।कल्लू खेतिहर की बीवी बगल के घर आई है।
" कल अनाज लेने जाना होगा", कल्लू की बहुरिया इतराती हुई बोली।
" कहा से?"अनजान बनती हुई मास्टर भोला दास की बीवी ने उसे कुरेदा।
"अरे, तुझे नहीं पता है?कल सरकारी राशन बंटेगा।"
" अच्छा।वही करोना वाला क्या,दीदी?"
" हां री बुरबक।" कल्लू बहू ऐंठकर बोली जैसे जंग जीत गई हो।
" अच्छा जाने दो, दीदी।वो सब तो गरीब मजलूमों की खातिर है न।हम कब से गरीब हो गए?" पुरानी साड़ी में गरीबी छिपाती मास्टर साहब की बीवी ने जैसे उसके कान उमेठ दिए हों।
"धत्त....।" नई चमकदार साड़ी में अपनी गरीबी दिखाती कल्लू बहू पैर पटकती हुई बाहर निकल गई।
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on March 28, 2020 at 8:39pm

आपका आभार आदरणीय समर जी,नमन।

Comment by Samar kabeer on March 28, 2020 at 8:08pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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