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गजल

हमें धर जमाने में जमाने लगे ।
मिटाने में उन्हें चंद बहाने लगे ।।

मसीहा उस वक्त वो बन गये मेरे ।
जहाॅ के गम जब भी सताने लगे ।।

बचपन की यादें ताजा हो गई ।
जब छत पे पतंग उडाने लगे ।।

होश उस दम फाख्ता हो गए मेरे ।
वो जब मुझको मुझसे चुराने लगे ।।

जिनको अपने दर रहने को जा दी।
अफसोस वो हमें दरबदर कराने लगे।।

जिनको हमने जीने के लिए जिया दी।
अफसोस वो अंधेरे में घुमाने लगे।।

जुर्मो-सितम अपने जब छुपा न सके ’चंदन’।
तब खुदी को दर-बदर छुपाने लगे ।।




नेमीचन्द पूनिया ’चंदन’
41 भलावतों का बास भैरूघाट
पाली मारवाड 306401 राजस्थान।

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Comment by Tapan Dubey on March 23, 2011 at 4:41pm
बचपन की यादें ताजा हो गई ।
जब छत पे पतंग उडाने लगे ।।


होश उस दम फाख्ता हो गए मेरे ।
वो जब मुझको मुझसे चुराने लगे ।।


behtrin sher badhai.

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