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Samar kabeer's Blog (99)

नसरी नज़्म :- तन्क़ीद निगार

तनक़ीद निगार

अच्छा भी,बुरा भी

अच्छा इसलिये कि वो

हमें हमारी ख़ामियाँ बताता है

हमें सही सम्त (दिशा) देता है

लेकिन जब यही तनक़ीद निगार

प्रोफ़ेश्नल,कारोबारी,हो जाता है

तब ये तख़लीक़ के

महासिन नहीं देखता

उस तख़लीक़ में

धड़कता दिल नहीं देखता

उसकी नज़र सिर्फ़ और सिर्फ़

ऐब तलाश करती है

उस तख़लीक़ में

जो शाईर की,कवि की,

लेखक की,मुसन्निफ़ की

अपनी जागीर है

वो इसमें ऐब निकालकर,कीड़े निकालकर

ख़त्म कर देता है

उस महल को जो ख़यालों… Continue

Added by Samar kabeer on May 4, 2015 at 11:12pm — 15 Comments

ग़ज़ल :- ज़िन्दगी जोड़ने घटाने में

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन/फ़ेलान



ज़िन्दगी जोड़ने घटाने में

आगए मौत के दहाने में



सब ही सुनते हैं शौक़ से उसको

ज़िक्र तेरा हो जिस फ़साने में



गालियाँ खाके भी निगलते रहे

हीरे मोती थे उसके खाने में



उसकी आँखो का वो फ़ुसूं,तौबा

आगए हम भी वरग़लाने में



ये उसी नस्ल के तो हैं,जिनका

नाम है हड्डियाँ चबाने में



जैसे हो वैसे क्यूँ नहीं दिखते

मसलहत क्या है मुस्कुराने में



आप ईमान लाए हो भाई

फिर भी तकरार… Continue

Added by Samar kabeer on May 2, 2015 at 10:31am — 24 Comments

ग़ज़ल :- कहीं थे बाज़ू कहीं बदन था

बह्र :- फ़ऊल फ़ैलुन फ़ऊल फ़ैलुन



कहीं थे बाज़ू कहीं बदन था

हिजाब आलूद पैरहन था



निगाह ख़ंजर बनी हुई थी

नज़र हटाई तो गुलबदन था



कहाँ तलक उससे बच के चलते

वो डाली डाली चमन चमन था



समझ के गुलशन की बात की थी

मुराद मेरी तिरा बदन था



सालीक़ा लाओगे वो कहाँ से

सुना है फ़रहाद कोहकन था



हर एक मंज़िल पे देखा जाकर

वही सितारा वही गगन था



भला सा लगता था उन दिनों में

तिरी अदा में जो बांकपन था



अभी "समर" की… Continue

Added by Samar kabeer on April 29, 2015 at 10:43am — 29 Comments

ग़ज़ल :-एक चहरे में दूसरा क्या है

बह्र :- फ़ाईलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन



आईनागर ज़रा बता क्या है

एक चहरे में दूसरा क्या है



आग गुलज़ार कैसे बनती है

देखना है तो सोचता क्या है



किस लिये हम से पूछता है नदीम

तू नहीं जानता,हुवा क्या है



क्या छुपा कर रखा है सीने में

और होटों से बोलता क्या है



दिल को छू जाए तो ये जादू है

वरना आवाज़ में धरा क्या है



आईने की तरह चमकती है

हम बताऐं तुम्हें वफ़ा क्या है



दोनों बर्बाद हो गए देखो

दुश्मनी के लिये… Continue

Added by Samar kabeer on April 20, 2015 at 10:30am — 28 Comments

नसरी नज़्म :- "शाईरी"

शाईरी

सिर्फ़ ग़ज़ल का नाम नहीं

इसके अनेक रूप हैं

कहीं साया कहीं धूप है

शाईरी

सुक़रात ने की,मीरा ने की

मज़दूर ने की,धनवान ने की

इसमें क़ाफ़िया लाज़िम नहीं

इसमे बह्र भी लाज़िम नहीं

आप जो ख़ूबसूरत बाते करते हैं

वो शाईरी है

शाईरी नज़ाकत का नाम है

इससे सबको काम है

शाईरी के लिये लाज़िम है अहसास

दर्द भरा दिल,जैसे बिस्मिल

सब शाईर के हैं

शाईर सबका होता है

जैसे भगवान सब का होता है

शाईरी सिर्फ़ ग़ज़ल का नाम… Continue

Added by Samar kabeer on April 17, 2015 at 11:58pm — 12 Comments

नसरी नज़्म :- "शहीद"

उस शहीद का तसव्वुर

ज़ह्न से नहीं निकलता

शर्म से सर झुका हुवा है

दर्द दिल में छुपा हुवा है

इस तसव्वुर ने मेरे रोज़-ओ- शब

मेरे अपने नहीं रहने दिये

मैं उसी का होकर रह गया हूँ

कहीं खो गया हूँ

उसका रुत्बा मुझे झंझोड़ता है

सूखे ज़ख़्मों को फिर उधेड़ता है

मेरे अंदर सदा लगाता है

मेरे अहसास को जगाता है

मुझ से कोई सवाल है उसका

इश्क़ भी ला ज़वाल है उसका

मुझसे इतना ही चाहता है वो

उसकी क़ुर्बानी को मैं आम करूँ

और जिहालत का क़त्ल-ए-आम… Continue

Added by Samar kabeer on April 15, 2015 at 11:28am — 13 Comments

ग़ज़ल :- जैसे.मिरे अंदर से ख़ुदा बोल रहा है

बह्र :- मफ़ऊल मफ़ाईल मफ़ाईल फ़ऊलुन





सच बोल रहा हूँ तो ये महसूस हुवा है

जैसे मिरे अंदर से ख़ुदा बोल रहा है



समतों क तअय्युन है न मंज़िल का पता है

इंसान मशीनों की तरह भाग रहा है



ठहरे हुए पानी पे कोई नाव रुकी है

इक गीत फ़ज़ाओं में अभी गूंज रहा है



इस हद पे हैं तहज़ीब की मिटती हुई क़दरें

रिश्तों को ज़मीनों की तरह बाँट दिया है



जिस दिन से दरिन्दों की सिफ़त आई है इसमें

इंसान ख़ुद अपना ही लहू चाट रहा है



फैले हुए हाथों पे… Continue

Added by Samar kabeer on April 12, 2015 at 10:52am — 16 Comments

ग़ज़ल :- तिरा दिल है कि पत्थर हँस रहा है

तिरा दिल है कि पत्थर हँस रहा है

ख़ुद अपना घर जलाकर हँस रहा है



बड़े लोगों की बातें भी बड़ी हैं

लगा,जैसे समन्दर हँस रहा है



सलीक़ा मन्द रो देते हैं जिस पर

तू ऐसी बात सुन कर हँस रहा है



बुराई का बुरा अंजाम होगा

फ़क़ीरों पर तुअंगर हँस रहा है



नहीं है ख़ुश कोई आबाद होकर

कोई बर्बाद होकर हँस रहा है



समझ लेना क़यामत आ गई है

अगर देखो,सुख़न्वर हँस रहा है



मिरी बर्बादियों पर ख़ुश है इतना

वो दिल पर हाथ रखकर हँस रहा… Continue

Added by Samar kabeer on April 7, 2015 at 12:00am — 30 Comments

ग़ज़ल :-सभी कहते हैं अच्छा बोलता है

बह्र:- फ़ऊलुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन



सभी कहते हैं अच्छा बोलता है

जो हम बोलेंगे तोता बोलता है



हमारा काम क्या उन महफ़िलों में

जहाँ दौलत का नश्शा बोलता है



कोई लोरी सुनाओ,गीत गाओ

अधूरा एक सपना बोलता है



ज़रा महकी हुई ज़ुल्फों की ठंडक

कई रातों का जागा बोलता है



मैं सच्चाई की बातें कर रहा हूँ

समझते हैं दिवाना बोलता है



तिरी शक्ति है अपरम पार मौला

तिरे आगे तो गूंगा बोलता है



छुपाए से नहीं छुपती… Continue

Added by Samar kabeer on April 3, 2015 at 10:32pm — 40 Comments

ग़ज़ल :- उजाला काटने को दौड़ता है |

बह्र :-फ़ऊलुन फ़ाईलातुन फ़ाईलातुन



दिवाना पन नहीं तो और क्या है

उजाला काटने को दौड़ता है



यही छोटा सा घर दुनिया है मेरी

इसी का नाम जन्नत रख दिया है



मैं भूका हूँ मुझे रोटी खिला दो

कोई साइल गली में चीख़ता है



मैं सच्चाई के पैरों पर खड़ा हूँ

मुक़ाबिल झूट के सर पर खड़ा है



सभंल कर ए दिल-ए-नादाँ सभंल कर

तू किन ऊंचाईयों को छू रहा है



वहीं से रोशनी फूटी है यारो

जहाँ मेरा सितारा डूबता है



"समर" दिल आपने तोड़ा… Continue

Added by Samar kabeer on March 30, 2015 at 12:14pm — 32 Comments

ग़ज़ल :- तन्हाई में अक्सर सोचा करते हैं

बह्र:-फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ै



तन्हाई में अक्सर सोचा करते हैं

हम को क्या करना था और क्या करते हैं



हम शाईर हैं,हम से क्या पोशीदा है

दुनिया को हर रंग में देखा करते हैं



उनसे बढ़कर झूट न कोई बोलेगा

जो भी सच कहने का दावा करते हैं



ऐसे भी नादान हैं जो घर का रोना

बाज़ारों में बैठ के रोया करते हैं



उनकी आदत है सैराब नहीं करते

क़तरा क़तरा प्यास बुझाया करते हैं



दुनिया वाले चैन से सोते हैं और हम

ज़ख़्मों की… Continue

Added by Samar kabeer on March 20, 2015 at 10:56pm — 28 Comments

ग़ज़ल-फागुन की मस्ती में

बड़ा चंचल हुवा जाता है मन फागुन की मस्ती में

नज़र आता है जब भीगा बदन फागुन की मस्ती में



लगी है दिल में ये कैसी अगन फागुन की मस्ती में

मज़ा देती है शोलों की तपन फागुन की मस्ती में



चली है झूमती गाती पवन फागुन की मस्ती में

खिला जाता है ये दिल का चमन फागुन की मस्ती में



सखी मन का मयूरा है मगन फागुन की मस्ती में

पिया से जा लगे मोरे नयन फागुन की मस्ती में



ये सोचा है कि इज़हार-ए-मुहब्बत कर ही डालूंगा

अगर हो जाएगा उन से मिलन फागुन की… Continue

Added by Samar kabeer on February 28, 2015 at 10:03pm — 12 Comments

ग़ज़ल-झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है |

झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है

हमने जो देखा है मंज़र लिख्खा है



अबजद हव्वज़ का भी जिन को इल्म नहीं

दुनिया ने उन को भी सुख़नवर लिख्खा है



आज उसी पर फूल वफ़ा के खिलते हैं

तुमने जिस धरती को बंजर लिख्खा है



पढ़कर देखो मेरी इन तहरीरों को

तुमको ही उन्वान बनाकर लिख्खा है



कुछ लोगों ने दौर-ए-ख़िज़ाँ के बारे में

कमरे में फूलों को सजाकर लिख्खा है



हमने बग़ावत करके सारी दुनिया से

महरूमी का नाम सिकन्दर लिख्खा है



"समर… Continue

Added by Samar kabeer on February 20, 2015 at 11:14pm — 42 Comments

ग़ज़ल

आशिक़ों की आँखो का रुख़ बदलने लगता है

जब किसी जवानी का चाँद ढलने लगता है



इब्तिदा ख़ुशामद से इल्तिजा से होती है

और फिर ये होता है,नाम चलने लगता है



सब्र की नसीहत भी काम कुछ नहीं करती

जब किसी की चाहत में दिल मचलने लगता है



हमने दिल को ले जाकर उस जगह पे रख्खा है

जिस जगह पे ख़्वाहिश का दम निकलने लगता है



जब भी मैं अंधेरों से हमकलाम होता हूँ

इक चराग़ सा मेरे दिल में जलने लगता है



आख़िरत के बारे में जब भी सोचता हूँ मैं

रूह… Continue

Added by Samar kabeer on February 15, 2015 at 10:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल

इक ग़रीब औरत की बेबसी का क़िस्सा है

सादगी समझते हो, सादगी का क़िस्सा है



मैं सुना रहा हूँ और आप मुस्कुराते हैं

थोड़ा सोचकर देखें आप ही का क़िस्सा है



एक था सख़ी हातिम ये वही रिवायत है

मेरे मोहतरम महमाँ ये उसी का क़िस्सा है



एटमी धमाकों का इन पे क्या असर होगा

अब भी इनके मकतब में जलपरी का क़िस्सा है



बुलबुलों के होटों पर गुलशनों की बातें हैं

आदमी के होटों पर आदमी का क़िस्सा है



रोज़ ही वो सुनते थे, पूछ ही लिया इक दिन

किस हसीं… Continue

Added by Samar kabeer on February 10, 2015 at 10:42pm — 11 Comments

ग़ज़ल

समझ कर भी ये कुछ समझा नहीं है

ख़ुदा से आदमी डरता नहीं है



हमें हक़ के लिये लड़ना पड़ेगा

ये मौक़ा हाथ मलने का नहीं है



शराफ़त की दुहाई देने वालों

मुक़ाबिल इतना शाइस्ता नहीं है



ये आवाज़ों का जंगल है यहाँ पर

कोई फ़न्कार की सुनता नहीं है



नज़र के सामने रहता है लेकिन

कभी हमने उसे देखा नहीं है



ये दुनिया है संभल कर पाँव रखना

तुम्हारे घर का बाग़ीचा नहीं है



मैं अपनी क़ब्र में लेटा हुवा हूँ

मुझे अब कोई अन्देशा नहीं… Continue

Added by Samar kabeer on February 7, 2015 at 3:30pm — 23 Comments

ग़ज़ल

सारी दुनिया को तमाज़त से बचा लेते हैं
हम वह बादल हैं जो सूरज को छुपा लेते हैं

मेरे ख़ुश होने से कब उन को खुशी होती है
मेरे एहबाब मिरे ग़म का मज़ा लेते हैं

शैर कहने का हुनर सबको कहाँ मिलता हैं
यूँ तो क़व्वाल भी अशआर बना लेते हैं

कितना मासूम है देखो ज़रा फूलों का मिज़ाज
तिशनगी औस के क़तरों से बुझा लते हैं

मुद्दतों हम को सताता रहा तहज़ीब का ग़म
आज इतना है कि आँखों को झुका लेते हैं

------ समर कबीर

मौलिक / अप्रकशित

Added by Samar kabeer on February 2, 2015 at 4:04pm — 17 Comments

ग़ज़ल

फंस गया चुंगल में जब शैतान के
हौसले बढने लगे इंसान के

तुमसे ये लग़ज़िश न हो जाए कहीं
हम बहुत पछताए दिल की मान के

उन से कह दो छोड़ दें भारत मिरा
लोग जो हामी हैं पाकिस्तान के

आप क्यूं ज़हमत उठाते हैं जनाब
ख़ुद ही दुश्मन हैं हम अपनी जान के

फ़िक्र उक़्बा की न दुनिया का ख़याल
सो गए ग़फ़लत की चादर तान के

बरकतें होने लगीं नाज़िल "समर"
पाँव घर में क्या पड़े महमान के

समर कबीर /मौलिक रचना अप्रकाशित

Added by Samar kabeer on January 25, 2015 at 6:12pm — 19 Comments

ग़ज़ल

कर नहीं सकता मैं करतब क्या करूं

हो गई ताज़ा ग़ज़ल अब क्या करूं

कोई न पूछे तो लब ख़ामोश हैं

ओर जो कोई पूछ ले तब क्या करूं

तेरी ना एहली पे जब उठठे सवाल

मेरे कहने का है मतलब क्या करूं

फिर जिहालत का अंधेरा छा गया

तू ही बतलादे मिरे रब क्या करूं

अपनी मरज़ी से तो जी सकता नहीं

मुझको लिखकर दीजिये कब क्या करूं

आख़िरत में सुर्ख़रू करना मुझे

लेके इस दुनिया का मनसब क्या…

Continue

Added by Samar kabeer on January 21, 2015 at 2:00pm — 21 Comments

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