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Rachna Bhatia
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नाथ सोनांचली commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-घर बसाना था
"आद0 रचना भाटिया जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने। आद0 समर साहब की इस्लाह से और निखर गयी। बधाई निवेदित करता हूँ।"
Oct 14
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-घर बसाना था
"वाह उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीया..."
Oct 10
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-घर बसाना था
"आ. रचना बहन , सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है। हार्दिक बधाई। आ. भाई समर जी की सलाह से यह और बेहतर हो जायेगी "
Oct 3
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-घर बसाना था
"आदरणीय दण्डपाणि नाहक जी हौसला बढ़ाने के लिए आभार।"
Oct 3
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-घर बसाना था
"आदरणीय समर कबीर सर् नमस्कार। सर्, आपने मतला बहुत ख़ूब कर दिया। आभार। बाकी आपके द्वारा बताए गई इस्लाह के अनुसार सुधार कर के आपको दिखाती हूँ। सादर।"
Oct 3
Samar kabeer commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-घर बसाना था
"मुह्तरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें I  'फिर से रूठा ख़ुदा मनाना था'  इस मिसरे को यूँ कह सकती हैं :- ' हमको रूठा ख़ुदा मनाना था ' 'छोड़ कर गाँव शह्र में उसने ढूँढना फिर से आब ओ…"
Oct 3
dandpani nahak commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-घर बसाना था
"आदरणीया रचना भाटिया जी सादर नमस्कार! बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
Oct 3
Rachna Bhatia posted a blog post

ग़ज़ल-घर बसाना था

2122 / 1212 / 221दिल का रिश्ता यूँ भी निभाना थाफिर से रूठा ख़ुदा मनाना था2चार ईंटें टिका के निस्बत कीआदमीयत का घर बसाना था3हम वही शाख़ काट बैठे हैंजिस प अपना भी आशियाना था4छोड़ कर गाँव शह्र में उसनेढूँढना फिर से आब ओ दाना था5उसका बेख़ौफ़ होना कहता हैरखता अंदाज़ काफ़िराना था6बाद मुद्दत के जान पाए हमदिल भी उसके लिए खिलौना था7क्यों उसी वक़्त आ गये आँसूजिस घड़ी हमको मुस्कुराना था8खेलकर बाज़ी इश्क़ की 'निर्मल'अपनी किस्मत को आज़माना था मौलिक व अप्रकाशितरचना निर्मलSee More
Oct 2
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-78 (विषय: 'विजय)
"आदरणीय मनन कुमार सिंह जी बहुत ख़ूब लघुकथा हुई बधाई।"
Sep 29
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"भाई लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी आपकी ग़ज़ल पर धुआँ पर अच्छी चर्चा चली।इसके "धुएँ" की चपेट में आकर मैं भी आ गई।:^) इसलिए अपने विचार रखना चाहती हूँ। अनिल कुमार सिंह जी की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि हम भाषा  के बिगड़े रूप को मान्यता…"
Sep 25
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदरणीया ऋचा यादव जी नमस्कार। आपने बहुत सुंदर बदलाव किए हैं।सर् के कहे अनुसार एक शेर और ठीक करने से आपकी ग़ज़ल बेहतरीन हो जाएगी।जिस मेहनत से आप सर् की टिप्पणी पढ़ कर सुधार करती हैं वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। अगर आपके पास थोड़ा समय हो तो मुझसे फोन पर बात…"
Sep 25
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी आपने सही कहा।"
Sep 25
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदरणीय ऋचा यादव जी आभार।"
Sep 25
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदरणीय दण्डपाणि नाहक जी हौसला बढ़ाने के लिए आभार।"
Sep 25
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदरणीय तस्दीक अहमद जी अच्छी ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें।"
Sep 25
Rachna Bhatia replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-135
"आदरणीय सालिक गणवीर जी इस्लाह के बाद बेहतरीन ग़ज़ल की बधाई स्वीकार करें।"
Sep 25

Profile Information

Gender
Female
City State
Delhi
Native Place
Delhi
Profession
Teacher
About me
nothing special... just start my journey ....

Rachna Bhatia's Blog

ग़ज़ल-घर बसाना था

2122 / 1212 / 22





1

दिल का रिश्ता यूँ भी निभाना था

फिर से रूठा ख़ुदा मनाना था

2

चार ईंटें टिका के निस्बत की

आदमीयत का घर बसाना था…

Continue

Posted on October 2, 2021 at 12:23pm — 7 Comments

ग़ज़ल-इश्क़ महब्बत धोखा था

22 22 22 2



1

आँख खुली तो जाना था

इश्क़ मुहब्बत धोका था

2

उधड़ी सीवन रिश्तों की

चुपके से वो सिलता था

3…

Continue

Posted on September 13, 2021 at 11:00am — 3 Comments

ग़ज़ल-मिलती दुआ है

1222/122

1

 हुआ वो ही ख़फ़ा है

किया जिसका भला है

2

ज़माने को पता है

तू मेरा आश्ना है

3…

Continue

Posted on September 3, 2021 at 11:04am — 6 Comments

ग़ज़ल- शिवाला लगा

122 122 122 12

1 तुझे जिसके लहज़े में ताना लगा

मुझे दिल से वो शख़्स सच्चा लगा

 2 ये मत पूछ क्या उसमें अच्छा लगा

 वो मासूम इक ज़िद्दी बच्चा लगा

3 तू सुन शोर पहले मेरे दिल का फिर

 बता क्यों तुझे मैं अकेला लगा

 4 बता वास्ता उससे रक्खूँ भी क्यों

 मुझे आदमी जब वो झूठा लगा

 5 थी कुछ बात या इश्क़ का था सरूर

हरिक चेहरा जो मुझको तेरा लगा

 6 मुहब्बत ही की है गुनह तो…

Continue

Posted on August 30, 2021 at 12:00pm — 7 Comments

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"आदरणीय दीपांजलि जी,  आपकी संलग्नता श्लाघनीय है. मैं आपकी रचनाओं के विन्यास से मुग्ध रहता हूँ.…"
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"जी, सही कहा आपने, आदरणीय. "
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"शुभातिशुभ "
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"सचेत रहने की बाध्यता है, निर्वहन करना होगा, आदरणीय.  जय-जय"
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सदस्य टीम प्रबंधन
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"आपकी स्पष्टोक्ति एवं मुखर स्वीकारोक्ति का सादर धन्यवाद, आदरणीय"
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"आ. दीपांजलि जी, सादर आभार।"
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"आ. दीपान्जलि जी, छन्दों का सुन्दर प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई।"
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