For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 188 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

बार का मिसरा मरहूम शायर जौन एलिया साहब की ग़ज़ल से लिया गया है।
तरही मिसरा है:
“आदमी आदमी को भूल गया”
बह्र 2122, 1212, 112/22 अर्थात् फ़ायलातुन्, मफ़ायलुन्, फ़यलुन् है।
रदीफ़ है “को भूल गया” और क़ाफ़िया है ‘ई’ का स्वर
क़ाफ़िया के पर्याप्त उदाहरण दी गयी मूल ग़ज़ल में ही हैं।


मूल ग़ज़ल एक उदाहरण है कि मशहूर शायर भी लंबी ग़ज़ल कहते रहे हैं। महत्वपूर्ण यह होता है कि शेर जैसे शेर होंए ऐसा न लगे कि संख्या भर है।

मूल ग़ज़ल यह है:
ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया
मैं तो उस ज़ख़्म ही को भूल गया।


ज़ात-दर-ज़ात हम-सफ़र रह कर
अजनबी अजनबी को भूल गया।


सुब्ह तक वज्ह-ए-जाँ-कनी थी जो बात
मैं उसे शाम ही को भूल गया।


अहद-ए-वाबस्तगी गुज़ार के मैं
वज्ह-ए-वाबस्तगी को भूल गया।


क्यूँ न हो नाज़ इस ज़ेहानत पर
एक मैं हर किसी को भूल गया।


सब दलीलें तो मुझ को याद रहीं
बहस क्या थी उसी को भूल गया।


सब से पुर-अम्न वाक़िआ ये है
आदमी आदमी को भूल गया।


क़हक़हा मारते ही दीवाना
हर ग़म-ए-ज़िंदगी को भूल गया।


ख़्वाब-हा-ख़्वाब जिस को चाहा था
रंग-हा-रंग उसी को भूल गया।


क्या क़यामत हुई अगर इक शख़्स
अपनी ख़ुश-क़िस्मती को भूल गया।


सोच कर उस की ख़ल्वत-अंजुमनी
वाँ मैं अपनी कमी को भूल गया।


सब बुरे मुझ को याद रहते हैं
जो भला था उसी को भूल गया।


उन से वा'दा तो कर लिया लेकिन
अपनी कम-फ़ुर्सती को भूल गया।


बस्तियो अब तो रास्ता दे दो
अब तो मैं उस गली को भूल गया।


उस ने गोया मुझी को याद रखा
मैं भी गोया उसी को भूल गया।


या'नी तुम वो हो वाक़ई..? हद है
मैं तो सच-मुच सभी को भूल गया।


आख़िरी बुत ख़ुदा न क्यूँ ठहरे
बुत-शिकन बुत-गरी को भूल गया।


अब तो हर बात याद रहती है
ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया।


उस की ख़ुशियों से जलने वाला 'जौन'
अपनी ईज़ा-दही को भूल गया।


मुशायरे की अवधि केवल दो दिन होगी । मुशायरे की शुरुआत दिनांक 25 फरवरी दिन बुधवार के प्रारंभ के साथ हो जाएगी और दिनांक 26 फरवरी दिन गुरुवार के समाप्त होते ही मुशायरे का समापन कर दिया जायेगा.

नियम एवं शर्तें:-

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" में प्रति सदस्य अधिकतम एक ग़ज़ल ही प्रस्तुत की जा सकेगी |

एक ग़ज़ल में कम से कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 11 अशआर ही होने चाहिए |

तरही मिसरा मतले को छोड़कर पूरी ग़ज़ल में कहीं न कहीं अवश्य इस्तेमाल करें | बिना तरही मिसरे वाली ग़ज़ल को स्थान नहीं दिया जायेगा |

शायरों से निवेदन है कि अपनी ग़ज़ल अच्छी तरह से देवनागरी के फ़ण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें | इमेज या ग़ज़ल का स्कैन रूप स्वीकार्य नहीं है |

ग़ज़ल पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे ग़ज़ल पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं | ग़ज़ल के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें |

वे साथी जो ग़ज़ल विधा के जानकार नहीं, अपनी रचना वरिष्ठ साथी की इस्लाह लेकर ही प्रस्तुत करें

नियम विरूद्ध, अस्तरीय ग़ज़लें और बेबहर मिसरों वाले शेर बिना किसी सूचना से हटाये जा सकते हैं जिस पर कोई आपत्ति स्वीकार्य नहीं होगी |

ग़ज़ल केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, किसी सदस्य की ग़ज़ल किसी अन्य सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी ।

विशेष अनुरोध:-

सदस्यों से विशेष अनुरोध है कि ग़ज़लों में बार बार संशोधन की गुजारिश न करें | ग़ज़ल को पोस्ट करते समय अच्छी तरह से पढ़कर टंकण की त्रुटियां अवश्य दूर कर लें | मुशायरे के दौरान होने वाली चर्चा में आये सुझावों को एक जगह नोट करते रहें और संकलन आ जाने पर किसी भी समय संशोधन का अनुरोध प्रस्तुत करें | 

मुशायरे के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है....

"OBO लाइव तरही मुशायरे" के सम्बन्ध मे पूछताछ

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो 25 फरवरी दिन बुधवार लगते ही खोल दिया जायेगा, यदि आप अभी तक ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सके है तो www.openbooksonline.comपर जाकर प्रथम बार sign upकर लें.

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" के पिछ्ले अंकों को पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक...

मंच संचालक

तिलक राज कपूर

(वरिष्ठ सदस्य)

ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम

Views: 1301

Replies are closed for this discussion.

Replies to This Discussion

आ. भाई तिलकराज जी, सादर अभिवादन।गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

बहुत सुंदर सुझाव दिया है।इसे मूल गजल में ले रहा हूँ। सादर...

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, अति सुंदर ग़जल के लिए बधाई स्वीकार करें।

आ. भाई दयाराम जी, अभिवादन व आभार।

2122 1212 112

बाप ख़ुद की ख़ुशी को भूल गया

आज बेटा उसी को भूल गया १

ज़ीस्त की उलझनों में यूँ उलझा

जीना मैं ज़िंदगी को भूल गया २

क्यों जुदा हो के मैं उदास हुई

तू भी अपनी हँसी को भूल गया ३

इश्क़ सर पे हुआ सवार तभी

मैं तेरी हर कमी को भूल गया ४

अब मुझे भी नहीं है याद कोई

देख तू भी किसी को भूल गया ५

भूल जा तू जो हो चुका पहले

बीती बातों को मैं भी भूल गया ६

जां “रिया” की निसार है तुझपे

तू मगर दोस्ती को भूल गया ७

गिरह

धर्म और जात पूछते हैं लोग

“आदमी आदमी को भूल गया”

अच्छी ग़ज़ल हुई है ऋचा जी।

मक्ता ख़ास तौर पर पसंद आया। बहुत दाद   

दूसरा शेर भी बहुत अच्छा

गिरह भी अच्छी लगी है। 

मतला और बेहतर हो सकता है। 

अन्य ग़ज़ल साधकों के सुझावों से भी ग़ज़ल और निखार पा जाएगी। उनकी राय का इंतज़ार है। 

सादर 

आदरणीय अजेय जी नमस्कार

बहुत बहुत शुक्रिया आपका , बेहतरी का प्रयास करूंगी

सादर

आ.रिचा जी अभिवादन। गजल प्रयास अच्छा हुआ है । लेकिन थोड़ा समय और देने से ये और निखर सकती है। गुणी जनो के सुझावों की प्रतीक्षा करें। फिलहाल मेरी ओर से हार्दिक बधाई।
*
इस शेर को कुछ इस तरह से भी देखिए कैसा लगरहा है ?
//
जब जुदा हो के तू उदास हुई
मैं भी अपनी हँसी को भूल गया ३
//
अब मुझे भी नहीं है याद कोई
देख तू भी किसी को भूल गया ५
इस शेर का भाव समझने में कुछ दिक्कत हो रही है।
//बीती बातों को मैं भी भूल गया ६//
यह मिसरा बेबह्र है देखिएगा।
*
गिरह
//धर्म और जात पूछते हैं लोग// को इस प्रकार करना कैसा रहेगा ?
*
जोर बस जाति धर्म का बाँकी
“आदमी आदमी को भूल गया”

आदरणीय लक्ष्मण जी अभिवादन

बहुत शुक्रिया आपका हौसला अफ़जाई के लिए 

3शेर का सुझाव अच्छा दिया आपने आभार 

5 को और साफ़ करने का प्रयास करती हूं 

6बेबहर नहीं काफिया ही ग़लत हो गया है मुआफी चाहती हूं

ग़ज़ल में सुधार का प्रयास करूंगी 

सादर

अभिवादन गुणीजन

कुछ सुधार किए हैं कृपया देखिएगा

तू जुदा हो के जब उदास हुई
मैं भी अपनी हँसी को भूल गया ३

याद रक्खूँगा ये कहा था जिसे
देख तू तो उसी को भूल गया ५

सब की सब डाल आया दरिया में
अपनी नेकी बदी को भूल गया ६

कुछ सुझाव

बाप ख़ुद की ख़ुशी को भूल गया
आज बेटा उसी को भूल गया १ (शेर को अभी और स्पष्ट किया जा सकता है)
एक उदाहरण:
जिसकी ख़ातिर खुशी को भूल गया
पुत्र वो बाप ही को भूल गया। (अभी यह भी कच्चा ही है लेकिन थोड़ा स्पष्ट है)

ज़ीस्त की उलझनों में यूँ उलझा (उलझनों में तमाम दुनिया की)
जीना मैं ज़िंदगी को भूल गया २ (जी रहा हूँ इसी को भूल गया)

क्यों जुदा हो के मैं उदास हुई (मैं बिछुड़कर उदास हूँ, तू क्यों )
तू भी अपनी हँसी को भूल गया ३ (हासिल-ए-ज़िन्दग़ी को भूल गया)

इश्क़ सर पे हुआ सवार तभी (हुस्न मुझ पर सवार होने से)
मैं तेरी हर कमी को भूल गया ४ (शेष सारी कमी को भूल गया)

अब मुझे भी नहीं है याद कोई (याद आयेगा, याद करने से)
देख तू भी किसी को भूल गया ५ (तू भी शायद किसी को भूल गया)

भूल जा तू जो हो चुका पहले (भूल जा तू गुजर गया जो भी)
बीती बातों को मैं भी भूल गया ६ (मैं तो हर इक (हरिक) कमी को भूल गया)

जां “रिया” की निसार है तुझपे (जां “रिया” ने निसार की तुझपर)
तू मगर दोस्ती को भूल गया ७ (बेवफ़ा तू उसी को भूल गया)

आदरणीय तिलक जी सादर अभिवादन 

बहुत बहुत धन्यवाद आपका 

बहुत अच्छे सुझाव हैं ग़ज़लमें निखार आ गया

आभार आपका 

ग़ज़ल की बेहतरी के लिए और भी प्रयास करूँगी 

सादर 

इस सुझाव को विशेष रूप से रूहानी नज़रिये से भी देखें
हुस्न मुझ पर सवार होने से

शेष सारी कमी को भूल गया

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari and आशीष यादव are now friends
3 minutes ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
4 minutes ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
15 minutes ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
5 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
5 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो…"
7 hours ago
आशीष यादव posted a blog post

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे…See More
9 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।"
10 hours ago
आशीष यादव commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"एक बेहतरीन ग़ज़ल रचा है आपने। बिलकुल सामयिक।  इस बढ़िया रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
10 hours ago
आशीष यादव commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"सदियों से मनुष्य प्रकृति का शोषण करता रहा है, जिसे विकास समझता रहा है वह विनास की एक एक सीढ़ी…"
11 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .अधर
"वाह। "
11 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .विविध
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत बढ़िया दोहों की रचना हुई है।  बधाई स्वीकार कीजिए।"
11 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service